Strait of Hormuz Crisis: अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान पर सत्ता परिवर्तन और परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने के इरादे से हमला किया था। लेकिन अब ये संघर्ष ईरान में सत्ता परिवर्तन से हटकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर कब्जे की जंग में तब्दील हो गया है। अमेरिका कई बार यह दावा कर चुका है कि होर्मुज पर अब उसका कब्जा है, लेकिन सच इससे उल्ट है। पहले जहां इस समुद्री रास्ते एक दिन में सैकड़ों जहाज गुजरते थे। वहीं, आज यहां से पूरे दिन में मुश्किल से 4-5 जहाज गुजर रहे हैं।
इसी बीच ईरान से एक बड़ी खबर सामने आई है। बताया जा रहा है ईरान दुनिया के तेल व्यापार के इस सबसे अहम रास्ते को लेकर 2029 तक कोई समझौता नहीं करने की योजना बना रहा है। जानकारी के मुताबिक यह फैसला ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई द्वारा हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में किए गए परिवर्तनों के बाद लिया गया है। आइए आपको बताते हैं कि ईरान क्यों 2029 तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर क्यों कोई समझौता नहीं करना चाहता है? मोजतबा खामेनेई ने इनता बड़ा फैसला अपने किस सैन्य कमांडर के भरोसे लिया है? और अगर ईरान 2029 तक होर्मुज को बंद रखता है तो इसका भारत समेत दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
मोजतबा खामेनेई ने हाल ही में ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में बड़े बदलाव किए हैं, इसमें कई सैन्य कमांडरों की नई नियुक्तियां की गई हैं। खामेनेई के इन फैसलों में सबसे अहम मोहसिन रजाई को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की जिम्मेदारी देने को माना जा रहा है। मोहसिन रजाई ईरान के सबसे वरिष्ठ सैन्य कमांडरों में से एक हैं। उनके पास 1988 के ईरान-इराक युद्ध का लंबा अनुभव है इसके अलावा वह करीब 18 सालों तक इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के प्रमुख के तौर पर काम कर चुके हैं।
ईरान में मोहसिन रजाई की पहचान एक कट्टरपंथी सैन्य कमांडर की रही है। दिलचस्प बात यह है कि मोहसिन रजाई वही कमांडर है जिन्होंने 1988 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान तत्कालीन सुप्रीम लीडर रुहल्ला खुमैनी को पत्र लिखकर यह बताया था लंबे युद्ध के कारण देश की सेना कमजोर हो गई है और फौज हथियारों की भारी कमी से जूझ रही है। ऐसे में उन्हें इराक के साथ संघर्षविराम कर लेना चाहिए। बताया जाता है कि रुहल्ला खुमैनी ने मोहसिन रजाई के इस पत्र के बाद भारी मन से युद्धविराम पर अपनी सहमति जताई थी। अब 38 साल बाद एक बार फिर मोहसिन रजाई को वर्तमान सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने नई जिम्मेदारी सौंपी है।
जानकारी के मुताबिक, खामेनेई ने मोहसिन रजाई को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का प्रमुख बनाया है। बताया जा रहा है कि रजाई का रुख पहले की तुलना में सख्त हो गया है। 1988 में जहां रजाई युद्ध खत्म करने के पक्षधर थे, वहीं अब वो चाहते हैं कि ईरान अमेरिका से 2029 तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता न करें। उनका मानना है कि ईरान का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण देश के परमाणु कार्यक्रम से भी बड़ा हो सकता है। उनकी नियुक्ति को ईरान की नई सुरक्षा नीति का अहम संकेत माना जा रहा है।
माना जा रहा है कि मोहसिन रजाई ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका से कोई भी समझौता नहीं करने का फैसला अपनी सोची समझी रणनीति के तहत लिया है। रजाई चाहते हैं कि ईरान अमेरिका के साथ होर्मुज को लेकर कोई भी समझौता तब करे, जब ट्रंप सत्ता में न हों। वो जानते हैं कि यह ट्रंप का राष्ट्रपति के तौर पर दूसरा कार्यकाल है और अब वो अमेरिकी संविधान के मुताबिक दोबारा राष्ट्रपति नहीं बन सकते हैं।
अमेरिका में अगला राष्ट्रपति चुनाव 2029 में निर्धारित है, इसलिए रजाई चाहते हैं कि अमेरिका के साथ कम से कम होर्मुज स्ट्रेट को लेकर कोई भी समझौता 2029 के बाद हो। जब अमेरिका को नया राष्ट्रपति मिलेगा। रजाई का मानना है कि अगर ईरान ऐसा करने में कामयाब हो जाता है, तो वो 2029 में नए अमेरिकी राष्ट्रपति को अपनी अधिक से अधिक शर्तें मानने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
हालांकि, ईरान के इस फैसले का असर खाड़ी देशों के तेल व्यापार पर पड़ा रहा है और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके चलते ओमान ने हाल ही में ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर एक बड़ा प्रस्ताव दिया था। ओमान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से ईरान को 3 प्रतिशत कमीशन देने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन ईरान इसे यह कहते हुए ठुकरा दिया कि उसे कम से कम 5 से 7 प्रतिशत कमीशन चाहिए। इसके चलते दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी।
होर्मुज संकट का भारत पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 100 प्रतिशत खाड़ी देशों से आयात करता है। ऐसे में अगर ईरान अपनी बात पर अड़ा रहा और होर्मुज संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो देश में तेल की कीमतों में इजाफा देखने को मिल सकता है। जानकारी के मुताबिक, अगस्त में इंडियन बास्केट में कच्चे तेल की कीमत 85.85 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है।
भारत के साथ-साथ ईरान के रुख से पूरी दुनिया पर भी बुरा असर पड़ेगा, खासकर यूरोपीय देशों पर जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए फिलहाल पूरी तरह से खाड़ी देशों पर निर्भर हैं। यूरोपीय देशों के पास दो विकल्प बचते हैं, पहला रूस से तेल और गैस खरीदने का था, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते वो पहले मास्को से तेल खरीदना बंद कर चुके हैं। दूसरा अमेरिका से मंहगा तेल खरीदना। हालांकि ऐसा करने पर उनकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।