राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे। इमेज-सोशल मीडिया 
पश्चिम बंगाल

कांग्रेस अब पहुंचाएगी भाजपा को फायदा! अकेले चुनाव लड़ने के फैसले से ममता बनर्जी को कितना नुकसान?

West Bengal Assembly Election News : हाल के वर्षों में कांग्रेस ने अधिकतर प्रदेशों में अकेले चुनाव लड़ने के बजाय दूसरे दलों के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा, ताकि भाजपा को सत्ता से दूर रखा जा सके।

रंजन कुमार

West Bengal Assembly Election Latest News : पश्चिम बंगाल की सियासत में कांग्रेस ने एक ऐसा 'जुआ' खेला है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। राज्य की सभी 294 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का कांग्रेस का यह फैसला एक साहसिक कदम माना जा रहा है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह फैसला कांग्रेस के संगठन में नई जान फूंकेगा या फिर परोक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत की राह आसान कर देगा।

पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ हाथ मिलाया, लेकिन यह रणनीति अक्सर कांग्रेस के लिए ही आत्मघाती साबित हुई। बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक गठबंधन में कांग्रेस का स्ट्राइक रेट गिरता गया और संगठन जमीनी स्तर पर कमजोर होता चला गया। बंगाल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से तर्क दे रहा था कि जब तक पार्टी अपने दम पर नहीं लड़ेगी, उसका जनाधार वापस नहीं आएगा। भले ही अभी हार मिले, लेकिन भविष्य के लिए संगठन मजबूत करना जरूरी है।

इतिहास के आइने में कांग्रेस का प्रदर्शन

अगर हम पिछले चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें तो कांग्रेस की स्थिति मिली-जुली रही है। साल 2006 में जब कांग्रेस पार्टी अकेले लड़ी, तो उसे 21 सीटें मिली थीं। 2011 में ममता बनर्जी के साथ गठबंधन करने पर यह संख्या बढ़कर 42 हो गई और 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने में कांग्रेस ने बड़ी भूमिका निभाई। 2016 में वाम दलों के साथ हाथ मिलाने पर कांग्रेस को 44 सीटें मिलीं, लेकिन 2021 के चुनाव में यह प्रयोग पूरी तरह विफल रहा और पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका।

किसे होगा नफा और किसे नुकसान?

कांग्रेस के अकेले मैदान में उतरने से सबसे बड़ा संकट ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों के सामने खड़ा हो गया है। माना जा रहा है कि त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव होना तय है। यदि मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष वोट बैंक बंटता है, तो इसका सीधा गणितीय लाभ भाजपा को मिल सकता है। वैसे, राजनीति संभावनाओं का खेल है। कांग्रेस का यह निर्णय तृणमूल और वामपंथियों की नींव भले ही कमजोर करे, लेकिन पार्टी इसे अपने 'पुनर्जन्म' के तौर पर देख रही है। अब यह तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि यह फैसला ऐतिहासिक मास्टरस्ट्रोक साबित होता है या फिर एक बड़ी रणनीतिक चूक।

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