पिंडदान और तर्पण  (सोर्स- नवभारत लाइव)
वाराणसी

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ संदेश: काशी में 10 हजार अजन्मी आत्माओं का पिंडदान, गंगा तट पर गूंजे वैदिक मंत्र

Varanas Pitru Paksha 2026: दशाश्वमेध घाट पर मातृ नवमी के अवसर पर आगमन सामाजिक संस्था ने 10 हजार अजन्मी बेटियों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण किया। 1.60 लाख से अधिक बेटियों के तर्पण हुआ।

धर्मेंद्र कुमार चौबे, स्निग्धा श्रीवास्तव

Unborn Girls Pind Daan Varanasi Dashashwamedh Ghat: "पिंडदान तो एक बहाना है, असल में अंधे मां-बाप को जगाना है..." काशी के पवित्र दशाश्वमेध घाट पर जब वैदिक मंत्रोच्चार गूंज रहे थे, तब गंगा की लहरें भी जैसे बेटियों के इस मौन दर्द से ठहर सी गईं। अवसर था पितृपक्ष की मातृ नवमी का, जब 'आगमन सामाजिक संस्था' के तत्वावधान में डॉ संतोष ओझा ने उन बदनसीब बेटियों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण अनुष्ठान किया, जिन्हें दुनिया में आने से पहले ही उन्हीं के अपनों ने कोख में मार दिया। ​सनातन शास्त्रों में वर्णित निर्देशों के अनुसार 5 वैदिक आचार्यों के सानिध्य में लगभग 10,000 अजन्मी बेटियों का पिंडदान, तर्पण, पंचबलि और ब्राह्मण भोज संपन्न हुआ।

गंगा की माटी से बनी वेदी पर आहुत हुईं अजन्मी आत्माएं

श्राद्ध पक्ष के सबसे उत्तम एवं मोक्षदायी अपराह्न काल में पतित पावनी मां गंगा की घाट पर मां गंगा की पवित्र मिट्टी से विशेष वेदी का निर्माण कर अनुष्ठान का शुभारंभ हुआ।

वेदी निर्माण एवं भूमि संस्कार

अपराह्न काल गंगाजी की पावन माटी से पिंड वेदी का निर्माण कर गंगाजल, कुशा एवं अग्नि से भूमि का संस्कार किया गया। आचार्यों के वेद मंत्रोचार के बीच वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ।

पिंडदान और तर्पण
​“बेटियां दो कुलों की रक्षक हैं, फिर भी समाज अंधा है” "सनातन धर्म में बेटियों को दो कुलों का रक्षक और लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। लेकिन आधुनिकता और आधुनिक तकनीक के इस दौर में लोग पेट में ही उनकी हत्या कर अपने और समाज के विनाश का रास्ता चुन रहे हैं। हमारा यह अनुष्ठान केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि उन अंधे माता-पिता और सोए हुए समाज को जगाने की एक तीखी आवाज़ है।"
डॉ. संतोष ओझा (संस्थापक सचिव, आगमन सामाजिक संस्था)
पिंडदान और तर्पण

संकल्प एवं प्रेत आवाहन

वैदिक मंत्रोच्चार एवं शांति पाठ के साथ श्राद्धकर्ता एवं संस्था के संस्थापक सचिव डॉ. संतोष ओझा ने वैदिक आचार्यों के निर्देशन में कोख में मार दी गईं अजन्मी बेटियों की अतृप्त आत्माओं का श्रद्धापूर्वक आवाहन किया गया। इसके साथ ही पितृसत्तात्मक अंधाधुंधता से मुक्ति और उनकी आत्मा की शांति का संकल्प लिया गया।

अजन्मी बेटियों के प्रति पश्चाताप और सम्मान प्रकट करते हुए कुशा, जौ, तिल एवं गंगाजल के साथ पिण्ड अर्पित कर पिंड पूजन कच्चा सूत, चंदन, फूल-माला, धूप-दीप नैवेद्य प्रदान कर प्रत्येक पिण्ड को बेटी के प्रतीक रूप में स्थापित कर उनकी सद्गति हेतु प्रार्थना किया गया।

तर्पण विधान-शीतल जल से तृप्ति

सनातन रीतियों का पालन करते हुए दक्षिण दिशा की ओर मुख कर अजन्मी आत्माओं को जल अर्पित (तर्पण) किया गया, ताकि उनकी आत्मा को परम शांति और मोक्ष प्राप्त हो सके।

क्षमा प्रार्थना एवं विसर्जन

अनुष्ठान के अंत में समाज में व्याप्त इस कुरीति के प्रति ईश्वर से क्षमा-याचना की गई और पिंडों का मां गंगा की धारा में आदरपूर्वक विसर्जन कर शांति की कामना की गई।

​सुबह 7 बजे से जुटे कार्यकर्ता, तैयार किए 10 हजार पिंड

​अनुष्ठान की भव्यता और संवेदनशीलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रातः 7:00 बजे से ही दशाश्वमेध घाट पर संस्था के दर्जनों कार्यकर्ता जुटने लगे थे। जौ के आटे, शहद, देसी घी, काले तिल और पवित्र गंगाजल के पावन मिश्रण से 10,000 पिंडों का निर्माण किया गया।

​13 वर्षों में 1.60 लाख से अधिक बेटियों की मुक्ति का संकल्प

​महिला सशक्तिकरण और कन्या भ्रूण हत्या जैसे महापाप के विरुद्ध वर्ष 2001 से लगातार जन-जागरण अभियान चला रही 'आगमन संस्था' का यह 13वां वार्षिक पिंडदान अनुष्ठान था। श्राद्धकर्ता और संस्था के संस्थापक सचिव डॉ संतोष ओझा पिछले 12 वर्षों में अब तक 1.5 लाख से अधिक अजन्मी बेटियों का तर्पण कर चुकी है। इस वर्ष के 10,000 पिंडों को मिलाकर यह आंकड़ा 1 लाख 60 हजार पार कर गया है।

​इनका रहा मार्गदर्शन

​वैदिक अनुष्ठान का मार्गदर्शन आचार्य पं. दिनेश दुबे, पं. धनंजय तिवारी और पं. सीताराम जी ने किया। ​व्यवस्था और पिंड निर्माण में राहुल गुप्ता, हरिकृष्ण प्रेमी, शिव जी, जितेंद्र किरण जादूगर, भानु प्रताप, कुमारी संतोषी, साधना, कुंदन, लव तिवारी अजय दूबे रामबली मौर्य, प्रताप मिश्रा, आशुतोष, अरुण गुप्ता, मदन गुप्ता लखन जी समेत कई समर्पित कार्यकर्ताओं ने अपनी निष्ठापूर्ण सेवाएं दीं।

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