पितृपक्ष में क्यों मनाया जाता है हाडपक्या गणपति उत्सव? नागपुर के भोसले राजघराने ने 1787 में की थी इसकी शुरुआत

Hadapkya Ganpati Utsav in Pitripaksha: पितृपक्ष को श्राद्ध और तर्पण का समय माना जाता है, लेकिन विदर्भ में इस दौरान हाडपक्या गणपति की स्थापना होती है। जानिए 239 साल पुरानी इस अनोखी परंपरा के बारे में।
Hadapkya Ganpati Utsav in Pitripaksha
हाडपक्या गणपति उत्सवसोर्स: AI
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Hadapkya Ganapati 239-Year-Old Tradition: महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में गणेशोत्सव की एक ऐसी परंपरा भी है, जो सामान्य गणेश उत्सव से बिल्कुल अलग समय पर मनाई जाती है। इसे हाडपक्या गणपति उत्सव कहा जाता है। यह उत्सव गणेशोत्सव से अलग है।

नागपुर समेत विदर्भ के कई हिस्सों में आज भी इस परंपरा को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। इस उत्सव की शुरुआत वर्ष 1787 में होने का उल्लेख मिलता है। यानी इस परंपरा को करीब 239 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

पितृपक्ष में गणपति उत्सव की अनोखी परंपरा

हिंदू धर्म में आमतौर पर पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इसके बावजूद विदर्भ में इसी समय गणपति उत्सव मनाया जाता है। यही वजह है कि यहां मनाया जाने वाला गणपति उत्सव अपनी अलग पहचान रखता है।

मध्य प्रदेश के पांढुर्णा-छिंदवाड़ा में भी हाडपक्या गणपति उत्सव

विदर्भ के साथ-साथ मध्य प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में हाडपक्या गणपति उत्सव मनाया जाता है। नागपुर से सटे पांढुर्णा और छिंदवाड़ा जिले के बड़ी संख्या में मराठी लोग रहते हैं। इसी कारण इन इलाकों में भी हाडपक्या गणपति उत्सव मनाया जाता है।

हाडपक्या गणपति नाम कैसे पड़ा?

स्थानीय परंपरा के अनुसार विदर्भ में पितृपक्ष को हाडपक भी कहा जाता है। इसी वजह से पितृपक्ष में स्थापित किए जाने वाले गणपति को हाडपक्या गणपति कहा गया। कुछ जगहों पर इसे मस्कर्या गणपति के नाम से भी जाना जाता है।

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1787 में शुरू हुई थी हाडपक्या गणपति की परंपरा

इतिहास के अनुसार, नागपुर के भोसले राजघराने के श्रीमंत खंडोजी महाराज भोसले, जिन्हें चिमणाबापू के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने 1787 में इस उत्सव की शुरुआत की थी।

कहा जाता है कि बंगाल की स्वारी से लौटने के दौरान पारंपरिक गणपति उत्सव का समय समाप्त हो चुका था। इसके बाद राजपुरोहित और विद्वानों से चर्चा की गई और भाद्रपद कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी के दिन गणपति उत्सव मनाने का निर्णय लिया गया। यही परंपरा आगे चलकर हाडपक्या गणपति उत्सव के रूप में प्रसिद्ध हुई।

Hadapkya Ganapati 239-Year-Old Tradition
भोसले राजवाड़े की गणपति उत्सव की पुरानी तस्वीरसोर्स: सोशल मीडिया

कैसी होती है हाडपक्या गणपति की मूर्ति?

हाडपक्या गणपति की मूर्ति सामान्य गणेश प्रतिमाओं से अलग स्वरूप के लिए जानी जाती है। परंपरा के अनुसार, हाडपक्या गणपति की मूर्ति 18 हाथों वाली होती है। कुछ शिल्प परंपराओं में इसे महालक्ष्मी के 14 हाथ और गणपति के चार हाथों के संयुक्त स्वरूप से जोड़ा जाता है। गणपति के इस स्वरूप को अलग-अलग शक्तियों के एक साथ आने का प्रतीक माना जाता है।

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पहले होते थे लावणी और पोवाड़े

पुराने समय में हाडपक्या गणपति उत्सव केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं था। उत्सव के दौरान लावणी, भारूड, पोवाड़ा, नाटक, नकला और खड़ी गंमत जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। समय के साथ उत्सव का स्वरूप बदला। अब ऑर्केस्ट्रा, सुगम संगीत, नाटक व अन्य सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

10 दिन बाद होता है हाडपक्या गणपति का विसर्जन

नागपुर के महाल क्षेत्र स्थित भोसले राजवाड़े का हाडपक्या गणपति इस परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। पितृपक्ष की चतुर्थी पर गणपति की स्थापना की जाती है और उत्सव करीब दस दिनों तक चलता है। भाद्रपद कृष्ण द्वादशी को उत्सव का समापन कर गणपति का विसर्जन किया जाता है।

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