काशी विश्वनाथ मंदिर (सोर्स- AI जेनेरेटेड)
वाराणसी

सावन में काशी विश्वनाथ धाम में उमड़ा आस्था का सैलाब, 19 दिनों में 53.69 लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन

Kashi Vishwanath Temple: सावन के 19 दिनों में काशी विश्वनाथ मंदिर में 53,69,634 श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। सावन के अंत तक बाबा विश्वनाथ के दरबार में भक्तों की संख्या 80 लाख पहुंचने का अनुमान है।

धर्मेंद्र कुमार चौबे, स्निग्धा श्रीवास्तव

Kashi Vishwanath Temple During Sawan: सावन माह में बाबा विश्वनाथ के दर्शन-पूजन के लिए काशी में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सावन के 19 दिनों में अब तक 53,69,634 श्रद्धालु दर्शन-पूजन कर चुके हैं। मंदिर प्रशासन के अनुसार, सावन के प्रत्येक सोमवार को औसतन करीब 5.5 लाख श्रद्धालुओं ने बाबा के दरबार में हाजिरी लगाई।

बाबा विश्वनाथ के दर्शनकर श्रद्धालुओं ने किया जलाभिषेक

सावन के सोमवार और अन्य दिनों में भी देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु काशी पहुंच रहे हैं। बाबा विश्वनाथ के दर्शन के साथ श्रद्धालु गंगा स्नान कर मंदिर पहुंचकर जलाभिषेक और पूजन कर रहे हैं। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में लगातार भक्तों की भीड़ बनी हुई है।

श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन की ओर से व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण, दर्शन व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर विशेष इंतजाम किए गए हैं।

श्रद्धालुओं का आंकड़ा करीब 80 लाख तक पहुंचने का अनुमान

मंदिर प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, सावन माह के अभी नौ दिन शेष हैं। जिस तरह श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, उससे सावन समाप्त होने तक बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं का आंकड़ा करीब 80 लाख तक पहुंचने का अनुमान है।

सावन के शेष दिनों में भी काशी में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है। हर-हर महादेव के जयघोष से काशी विश्वनाथ धाम और आसपास का क्षेत्र लगातार गूंज रहा है।

सावन में जलाभिषेक का महत्व

बता दें कि सावन मास में भगवान शिव का जलाभिषेक करने का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि भगवान शिव का जलाभिषेक करने से मन शांत होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और विषैले तथा नकारात्मक प्रभावों से भी मुक्ति मिलती हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान शिव जी के हलाहल विष पीने के बाद उनकी जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया था तभी से सावन में भगवान शिव को जल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है।

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