

Agra Pothole Problem On Tedhi Bagiya-Jalesar Road: देशभर में सड़क सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े अभियान चलाए जाते हैं। सरकारें हादसों को रोकने के लिए तमाम दावे करती हैं, लेकिन सड़कों पर बने गड्ढे आज भी हजारों लोगों की जान के लिए खतरा बने हुए हैं। आगरा में इसी गंभीर समस्या के बीच एक ऐसा उदाहरण सामने आया है, जिसने सड़क सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही दोनों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
टेढ़ी बगिया से जलेसर रोड तक सड़क के गड्ढों से परेशान लोगों को जब लंबे समय तक स्थायी समाधान नहीं मिला तो इंजीनियर किशन सीटू चौहान ने इंतजार करने के बजाय खुद मोर्चा संभाल लिया। क्षेत्रीय लोगों के सहयोग से उन्होंने अपने निजी खर्चे पर सड़क के जानलेवा गड्ढों को भरने की पहल शुरू कर दी।
यह सिर्फ गड्ढे भरने की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें एक आम नागरिक को सड़क की मरम्मत के लिए खुद आगे आना पड़ रहा है।
किशन सीटू चौहान का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी विभाग या अधिकारी को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि सड़क पर चलने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उनका मानना है कि शिकायतें अपनी जगह हैं, लेकिन जब समस्या लोगों की जिंदगी से जुड़ी हो तो समाधान के लिए भी समाज को आगे आना चाहिए।
इस पहल में स्थानीय लोग भी उनके साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। बिना सरकारी बजट, बिना किसी बड़े प्रचार और बिना इंतजार के सड़क के गड्ढे भरे जाने का काम क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है।
आगरा की यह तस्वीर देश के उन तमाम शहरों और कस्बों की कहानी बयां करती है, जहां बारिश के बाद सड़कें गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं और इन गड्ढों की कीमत अक्सर वाहन चालकों और राहगीरों को हादसों के रूप में चुकानी पड़ती है।
सवाल यह है कि सड़क बनने के बाद उसकी गुणवत्ता और नियमित रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है? शिकायत मिलने के बाद मरम्मत के लिए कितने दिन की समयसीमा तय है? और यदि कोई गड्ढा हादसे का कारण बनता है तो जवाबदेही किसकी तय होती है?
इंजीनियर किशन सीटू चौहान की पहल ने इन्हीं सवालों को फिर सामने ला दिया है।
बताया जा रहा है कि प्रशासन ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए मौके का निरीक्षण किया है और सड़क की स्थायी मरम्मत की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। यदि यह कार्रवाई आगे बढ़ती है तो एक नागरिक की पहल सरकारी मशीनरी को स्थायी समाधान की दिशा में ले जाने का उदाहरण बन सकती है।
किशन सीटू चौहान लंबे समय से ‘नरेंद्र से नरेंद्र की ओर’ अभियान के माध्यम से क्षेत्रीय समस्याओं को उठाते रहे हैं। उनके प्रयासों से क्षेत्र में विभिन्न योजनाओं का लाभ पहुंचने का दावा भी किया जाता है।
लेकिन इस बार मुद्दा किसी योजना के लिए आवाज उठाने का नहीं, बल्कि उस सड़क का है जिस पर रोज हजारों लोग गुजरते हैं।
देश में सड़क दुर्घटनाओं पर बहस अक्सर तेज रफ्तार, ट्रैफिक नियमों और वाहन चालकों की लापरवाही तक सीमित रह जाती है। लेकिन खराब सड़कें और जानलेवा गड्ढे भी सड़क सुरक्षा की बड़ी चुनौती हैं।
आगरा का यह मामला इसी बहस को एक नया आयाम देता है- क्या सड़क सुरक्षा सिर्फ वाहन चालक की जिम्मेदारी है या सड़क बनाने और उसका रखरखाव करने वाली व्यवस्था की भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है?
किशन सीटू चौहान ने फिलहाल गड्ढे भरने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई है, लेकिन स्थायी समाधान अब प्रशासन को करना होगा।
क्योंकि किसी नागरिक की पहल व्यवस्था के लिए प्रेरणा जरूर बन सकती है, लेकिन देश की सड़कों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी आखिरकार सिस्टम की ही है।
अब देखना होगा कि टेढ़ी बगिया से जलेसर रोड तक शुरू हुई यह पहल सिर्फ कुछ गड्ढों को भरने तक सीमित रहती है या फिर यह प्रशासन को पूरे क्षेत्र की सड़कों की स्थायी मरम्मत के लिए मजबूर करती है।
क्योंकि सड़क का गड्ढा छोटा हो सकता है, लेकिन उससे पैदा होने वाला खतरा किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है।