Uttar Pradesh Assembly Elections 2027: अगले साल यानी की 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राज्य में सियासी सुगबुगाहट तेज हो गई है। एक तरफ सत्ताधारी दल बीजेपी अपने सहयोगी दलों के साथ चुनावी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गई है। वहीं, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव 'पीडीए' को साधने में लगे हुए हैं।
वहीं, बसपा प्रमुख मायावती भी चुनाव से पहले अपने संगठन को मजबूत करने के लिए सक्रिय हो गई हैं। यूपी में इस बार ब्राह्मण मतादाताओं के एक मजबूत वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ब्राह्मण वोटरों को साधने में जुट गई हैं।
यूपी विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 22 मई 2027 को खत्म हो रहा है। उससे पहले फरवरी 2027 तक राज्य विधानसभा का चुनाव हो सकते हैं। जिसको देखते हुए सपा और बसपा ब्राह्मण समाज को तवज्जों देने के कवायद शुरू कर चुके हैं। यही कारण है कि लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में 5 अगस्त 2026 को 'छोटे लोहिया' जनेश्वर मिश्र की जयंती के अवसर पर एक विशेष ब्राह्मण (प्रबुद्ध जन) सम्मेलनआयोजित किया गया।
पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की मौजूदगी में हुए इस आयोजन का उद्देश्य 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण समाज को साधना और अपने 'पीडीए' (PDA) समीकरण का दायरा बढ़ाना था।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बुधवार को एक पोस्ट करते हुए बसपा प्रमुख ने लिखा बीएसपी ने सर्वसमाज में से खासकर ब्राह्मण समाज को भी पार्टी में उनकी सन 2007 की तरह बीएसपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की तैयारी के हिसाब से, उन्हें बसपा उम्मीदवार बनाना जब से शुरू किया है तब से विरोधी पार्टियों में इसको लेकर चर्चा व चिंताएं दोनों होना स्पष्ट हैं, जिनके हथकण्डों से 'बहुजन समाज' के लोगों को लगातार सजग व सतर्क रहने की ज़रूरत है।
वहीं, विधानसभा चुनावों से ठीक पहले बहुजन समाज पार्टी ने सतीश चन्द्र मिश्र को लीगल व मीडिया के साथ-साथ चुनाव आयोग संबंधी कार्यों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने का ऐलान किया। सतीश चंद्र मिश्र को यह जिम्मेदारी देकर बसपा ने ब्राह्मण समाज को साधने की पूरी कोशिश की है।
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटरों की संख्या 11 प्रतिशत से 14 प्रतिशत माना जाता है। इसमें करीब 100 से अधिक ऐसी सीटें हैं, जिनमें ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। करीब 12 ऐसे जिले हैं, जहां पर ब्राह्मण समाज का वोट 15 प्रतिशत से अधिक है। इनमें बलरामपुर, बस्ती, महाराजगंज, संत कबीर नगर, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, वाराणसी, चंदौली, कानपुर, इलाहाबाद प्रमुख हैं।
यही नहीं पूर्वी से लेकर मध्य, बुंदेलखंड और पश्चिम उत्तर प्रदेश की करीब 100 से अधिक सीटों पर ब्राह्मण मतदाता भले ही संख्या में ज्यादा न हों लेकिन मुखर होने के कारण चुनावी नतीजे बदलने में अहम भूमिका निभाते हैं।
वैसे वोट शेयर की बात करें तो ब्राह्मण वर्ग की आबादी मुस्लिम और दलितों की आबादी कहीं कम है। लेकिन रणनीति के लिहाज से मुस्लिम और दलित सत्ता में उतनी दखल नहीं रखते, जितनी ब्राह्मण रखता है। प्रदेश में तकरीबन सभी पार्टियों ने इस वर्ग के नेताओं को अपने करीब ही रखा है।
इस रसूख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूपी के 21 मुख्यमंत्रियों में 6 ब्राह्मण रहे। इनमें भी नारायण दत्त तिवारी तो 3 बार सीएम रहे। यही नहीं हर सरकार में मंत्री पदों पर ब्राह्मणों की संख्या आबादी की तुलना में दूसरी जातियों से बेहतर ही रही।
यूपी की राजनीति को समझने वालों लोगों के अनुसार, मंडल कमीशन लागू होने के बाद राज्य में दलित और ओबीसी राजनीति का उदय हुआ, उसके बाद से लेकर अब तक कोई ब्राह्मण नेता मुख्यमंत्री नहीं बन पाया। हालांकि, मतदाता के रूप में यह समाज 90 के दशक के दौरान शुरुआती झटकों से उबरते हुए पुराना रसूख फिर से हासिल कर लिया है।
यही वजह है कि मनवादा का सीधा विरोध करने और मंडल कमीशन लागू होने के बाद बदले सियासी समीकरण में सत्ता पाने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी अब ब्राह्मण वोटरों को साधने के लिए अलग-अलग रणनीतियां बना रही हैं।
गोरखपुर
वाराणसी
देवरिया
जौनपुर
बलरामपुर
बस्ती
संत कबीर नगर
महाराजगंज
अमेठी
वाराणसी
चंदौली
कानपुर
प्रयागराज
उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव निर्धारित समय के अनुसार फरवरी-मार्च 2027 में होना संभावित है। मुख्य चुनाव आयोग के अनुसार, यूपी विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 22 मई 2027 को समाप्त हो रहा है, इसलिए इससे पहले राज्य में चुनावी प्रक्रिया संपन्न करा ली जाएगी।
राजनीतिक गलियारों में राष्ट्रीय जनगणना और अन्य कारणों से चुनाव पहले (2026 के अंत में) कराए जाने की अटकलें थीं, लेकिन भारतीय निर्वाचन आयोग ने साफ कर दिया है कि चुनाव अपने तय शेड्यूल पर ही होंगे।