इलाहाबाद हाईकोर्ट  (सोर्स- सोशल मीडिया)
प्रयागराज

हाईकोर्ट में बच्ची ने यौन उत्पीड़न के आरोपों से किया इनकार, अदालत ने पिता को सौंपी बेटी की कस्टडी

Prayagraj High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट में साढ़े पांच साल की बच्ची ने पिता पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों से इनकार किया। अदालत ने बच्ची से सीधे बातचीत के बाद उसकी अभिरक्षा पिता को सौंप दी।

ओमप्रकाश सिंह परिहार, स्निग्धा श्रीवास्तव

Allahabad High Court Child Custody Case: मां की ओर से पिता पर बेटी के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब साढ़े पांच साल की बच्ची से सीधे बातचीत कर उसकी स्थिति जानी। बच्ची ने अदालत के समक्ष पिता पर लगाए गए आरोपों से साफ इनकार किया। इसके बाद कोर्ट ने बच्ची की अभिरक्षा उसके पिता को सौंपते हुए मां की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका निस्तारित कर दी।

न्यायमूर्ति संदीप जैन बच्ची से की बातचीत

न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने 15 मई के आदेश के अनुपालन में बच्ची को अदालत में पेश किए जाने के बाद उससे बातचीत की। बच्ची ने बताया कि वह पुणे के एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ रही है और अपने पिता के साथ रहना चाहती है। उसने यह भी कहा कि पिता के साथ रहने में उसे किसी तरह की परेशानी नहीं है।

यौन उत्पीड़न के आरोपों से किया इनकार

बच्ची से उसके पिता पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के संबंध में भी सवाल किया गया। बच्ची ने आरोपों से स्पष्ट रूप से इनकार किया और कहा कि उसके पिता ने उसके साथ कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया। मां की ओर से पिता की मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने तथा उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत किए जाने का भी उल्लेख किया गया। इस मामले में थाना बीटा-2, गौतमबुद्ध नगर में मुकदमा दर्ज होने और जांच चलने की जानकारी अदालत को दी गई।

बच्ची को मोहरे के रूप में किया इस्तेमाल

अदालत ने कहा कि बच्ची के बयान से मां की ओर से लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं होती। हाईकोर्ट को प्रथमदृष्टया यह भी प्रतीत हुआ कि माता-पिता के वैवाहिक विवाद में बच्ची को मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि पिता की शैक्षिक और आर्थिक स्थिति बेहतर है तथा वह बच्ची की परवरिश के लिए अधिक सक्षम हैं।

हाईकोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए बच्ची की अभिरक्षा पिता को सौंप दी और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण कर दिया।

लंबित अपील पर अंतरिम राहत संभव

इसी आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि केवल विलंब से दाखिल अपील के कारण अंतरिम संरक्षण का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हो जाता। यदि संरक्षण नहीं दिया गया तो अपील निष्फल हो सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतरिम राहत देने का अधिकार न्यायालय के पास बना रहता है।

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