गणेश चतुर्थी  (सोर्स- नवभारत लाइव)
आगरा

दशकों से गढ़ी जा रही आस्था: मिट्टी, भूसे और हुनर से बनते हैं साक्षात गणपति, आगरा में पर्यावरण संरक्षण का संदेश

Agra Ganesh Chaturthi: आगरा के नामनेर में कोलकाता के मूर्तिकार परिवार की पांच दशक पुरानी परंपरा के तहत मिट्टी, चावल के भूसे और प्राकृतिक रंगों से पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं।

प्रदीप कुमार रावत, स्निग्धा श्रीवास्तव

Agra Eco friendly Ganesh Idols: गणेश चतुर्थी आने में भले ही अभी समय हो, लेकिन ताजनगरी के बाजारों में भगवान गणेश की प्रतिमाओं की मांग को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस बार खास बात यह है कि आधुनिक दौर में जहां प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाएं बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं, वहीं आगरा में करीब पांच दशक से कोलकाता की पारंपरिक मूर्तिकला मिट्टी और प्राकृतिक सामग्री के सहारे अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।

नामनेर स्थित राधा कृष्ण मंदिर परिसर में कोलकाता से आए मूर्तिकार परिवार की कार्यशाला इन दिनों आस्था और कला का अनूठा संगम बनी हुई है। करीब 50 वर्ष पहले कोलकाता से आगरा आए इस परिवार की कई पीढ़ियां भगवान गणेश, मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करने में जुटी हैं। उनके हाथों से तैयार प्रतिमाओं को देखकर ऐसा लगता है, जैसे मिट्टी में प्राण भरकर भगवान स्वयं धरती पर उतर आए हों।

गणेश चतुर्थी

मिट्टी और चावल के भूसे से तैयार होती हैं प्रतिमाएं

मूर्तिकारों के मुताबिक उनकी प्रतिमाओं में मिट्टी के साथ चावल के भूसे का प्रयोग किया जाता है। प्रतिमाओं को आकर्षक रूप देने के लिए इस्तेमाल होने वाले रंग भी पर्यावरण अनुकूल होते हैं। उनका दावा है कि विसर्जन के दौरान ये रंग पानी में घुल जाते हैं, जिससे पर्यावरण पर अपेक्षाकृत कम प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

मूर्तिकारों ने बताया कि गणेश चतुर्थी को लेकर इस बार भी काम शुरू हो चुका है। आगरा के अलावा आसपास के जिलों और दूसरे शहरों से भी प्रतिमाओं के ऑर्डर मिल रहे हैं। जरूरत के मुताबिक छोटी से लेकर करीब 30 फीट तक ऊंची प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं।

कहीं श्रीकृष्ण का रूप तो कहीं मां पार्वती की गोद में गणेश

इन प्रतिमाओं की सबसे खास बात उनका स्वरूप और बारीक कारीगरी है। कहीं भगवान गणेश को स्वर्णाभूषणों से सुसज्जित किया गया है तो कहीं उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप में सजाया गया है। कुछ प्रतिमाओं में गणपति अपनी मां पार्वती और पिता भगवान शिव की गोद में विराजमान नजर आते हैं।

गणेश चतुर्थी

प्रतिमाओं की आंखों, आभूषणों, मुकुट और चेहरे के भावों पर की गई बारीक कारीगरी उन्हें जीवंत बना देती है। यही वजह है कि कार्यशाला में तैयार होने वाली प्रतिमाएं केवल पूजा की सामग्री नहीं, बल्कि कला और आस्था का अद्भुत उदाहरण बन जाती हैं।

डेढ़ दशक में बढ़ी गणेश चतुर्थी की धूम

मूर्तिकार बताते हैं कि करीब 15-20 वर्ष पहले आगरा में गणेश चतुर्थी पर प्रतिमाओं की मांग आज की तुलना में काफी कम थी। लेकिन पिछले एक से डेढ़ दशक में गणेश चतुर्थी के आयोजन और सार्वजनिक पूजा का चलन तेजी से बढ़ा है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में बड़े स्तर पर गणपति स्थापना होने लगी है और श्रद्धालुओं की संख्या भी लगातार बढ़ी है।

मूर्तिकारों के अनुसार, आस्था के इस बढ़ते दायरे ने मूर्तिकारों के लिए भी नए अवसर पैदा किए हैं। अब श्रद्धालु केवल प्रतिमा खरीदना नहीं चाहते, बल्कि ऐसी प्रतिमा की तलाश करते हैं जिसमें भगवान के स्वरूप के साथ कलाकार की कल्पना और पारंपरिक कला की झलक भी दिखाई दे।

आगरा में पांच दशक से जारी कोलकाता के इस परिवार का हुनर इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। मिट्टी, भूसे, प्राकृतिक रंग और हाथों की बारीक कारीगरी से तैयार होती ये प्रतिमाएं यह संदेश भी देती हैं कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं।

राहुल गांधी के काफिले में हादसे की जांच के लिए SIT गठित, IG किरण एस. को मिली कमान

संजय राउत ने अमित शाह को लिखा पत्र, मनोज जरांगे-एकनाथ शिंदे 500 करोड़ डील विवाद पर ED जांच की मांग

राहुल गांधी मानहानि केस में बरी, सुल्तानपुर की MP-MLA कोर्ट ने खारिज किया मामला, अमित शाह पर की थी टिप्पणी

पुणे IISER लाइब्रेरी में मिली दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद की किताब, विवाद के बाद इंस्टीट्यूट ने हटाई

राहुल गांधी के काफिले की गाड़ियां पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर टकराईं, 2 लोग घायल, सुल्तानपुर में होनी है पेशी