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नवभारत निशानेबाज: नेता व आंदोलनकारी की खूबी, उमा भारती बेचतीं पोहा-जलेबी

Leaders Street Selling: उमा भारती के पोहा-जलेबी बेचने पर उठे सवालों के बीच यह संदेश उभरकर आता है कि नेता जनता से जुड़ने के लिए छोटे कामों से भी परहेज नहीं करते। यह सादगी और कर्मठता का प्रतीक है।

अंकिता पटेल

Navabharat Nishanebaaz: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, कैसी नौबत आ गई कि मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने अपने चुनाव क्षेत्र टीकमगढ़ में ठेला लगाकर पोहा और जलेबी बेची। नेताओं को तो कुशल विक्रेता या सेल्सपर्सन की तरह मोहक वादे और लुभावने आश्वासन बेचने चाहिए, यह पोहा और जलेबी बेचने की धुन क्यों सवार हुई ?'

हमने कहा, 'जनता से वास्ता रखना है तो नास्ता बेचना पड़ता है। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद बताया था कि बचपन में वह गुजरात के वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे। चाय के प्रति उनका लगाव आज तक खत्म नहीं हुआ। वह असम में चुनाव प्रचार के लिए गए तो चायबागान में जाकर पीठ के पीछे टोकरी बांधकर मजदूर महिलाओं के साथ चाय की पत्ती चुन-चुन कर तोड़ने लगे। इस तरह ये नेता संदेश देते हैं कि कर्मठ बनो। दुनिया में कोई काम छोटा नहीं है।'

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती जमीन से जुड़ी हैं। उन्होंने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के खिलाफ इस तरह सड़क पर पोहा-जलेबी बेचकर विरोध दर्शाया और अधिकारियों से गरीबों की रोजी-रोटी नहीं छीनने की अपील की। जब सरकार किसी को नौकरी-रोजगार नहीं दे सकती तो शांति से ठेला लगाकर अपने परिवार की गुजर-बसर करने वाले युवाओं के खिलाफ क्यों एक्शन लेती है? मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार है और उमा भारती भी बीजेपी की वरिष्ठ नेता हैं लेकिन फिर भी उन्होंने अपनों के ही खिलाफ इस तरह आंदोलन किया।'

हमने कहा, 'उमा भारती बचपन से ही प्रवचनकार रही हैं। वह जानती हैं कि अन्न ही परम ब्रम्ह है। भूखे भजन ना होई गोपाला। इसलिए उन्होंने पोहा बेचा। सुदामा के तंदुल या पोहे कृष्ण भगवान ने बड़े प्रेम से खाए थे। महाराष्ट्र में जब लोग शादी के लिए लड़की देखने जाते हैं तो वह पोहा बनाकर लाती है। चावल ऐसा अन्न है जिससे पोहा, लाही, मुरमुरा सब बनता है। इडली-डोसा भी चावल से बनता है।'

हमने कहा, 'आपको याद होगा कि उमा भारती मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तभी कर्नाटक के हुबलों में झंडा सत्याग्रह हुआ। उसमें भाग लेने के लिए उमा ने सीएम पद से इस्तीफा दिया और अपनी कुर्सी बाबूलाल गौर को सौंप दी। जब वह वापस लौटी तो बाबूलाल ने उन्हें मुख्यमंत्री पद वापस नहीं लौटाया। उमा भारती के जलेबी बेचने पर आश्चर्य मत कीजिए। राजनीति भी जलेबी के समान ही गोलमोल रहती है।'

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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