डोनाल्ड ट्रंप, भारत-अमेरिका व्यापार,(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)  
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नवभारत विशेष: ट्रंप ने फेक डाटा के आधार पर लगाया था टैरिफ, मनमाने दावे करने की आदत

Trump India Tariff Dispute: लेख में दावा किया गया है कि भारत पर टैरिफ को लेकर ट्रंप ने अमेरिकी व्यापार आंकड़ों को खारिज किया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि लेख में नहीं की गई है।

अंकिता पटेल

Trump India Trade Policy: भारत पर टैरिफ थोपने के लिए ट्रंप ने अपनी ही सरकार के डाटा को मानने से इनकार कर दिया था। ट्रंप का भारत के प्रति विकृत दृष्टिकोण केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार अंतरराष्ट्रीय शांति स्थापना तक है। अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान ट्रंप को व्हाइट, हाउस में पहुंचे हुए 10 दिन ही बीते थे कि 30 जनवरी 2024 को 'कमांडर का इरादा' स्थापित करने हेतु बैठक बुलाई गई, विशेषकर इसलिए कि रूस-यूक्रेन युद्ध पर विराम लगाया जा सके।

बैठक में वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक ने यूएसटीआर (ऑफिस ऑफ द यूएस ट्रेड रेप्रिजेंटिव) का डाटा पेश करते हुए बताया कि अमेरिकी गु पर भारतीय टैरिफ ट्रंप के अनुमान से बहुत कम है। डाटा इस बात के समर्थन में नहीं था कि ट्रंप भारत पर अत्यधिक टैरिफ लगाएं, ट्रंप ने ढेर सारी गालियां देते हुए अपनी ही सरकार के डाटा को 'बकवास' बताया। सभी अधिकारियों ने चाटुकारिता करते हुए ट्रंप की 'हां में हां' मिलाई।

लुटनिक के समर्थन में सिर्फ हाउस स्पीकर माइक जॉनसन थे, जिन्होंने कहा कि बेलगाम टैरिफ लगाने से अमेरिकी ऑटोमोटिव सेक्टर बर्बाद हो जाएगा, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? ट्रंप ने कहा कि वह जिम्मेदारी लेंगे और आखिरकार नतीजा यह हुआ कि दिल्ली पर 50 प्रतिशत टैरिफ थोप दिया गया, जो कि अमेरिका के सभी ट्रेडिंग पार्टनर्स में सबसे अधिक था और जिसकी वजह से अमेरिका व भारत के संबंध बिगड़े।

यह पहला अवसर नहीं था जब फेक डाटा, जिसका स्रोत कोई नहीं जानता, से भारत को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया गया। ट्रंप ने आईबीएम, डेल व इंटेल के प्रतिनिधियों पर दबाव डाला कि वह अपनी फैक्ट्रियां अमेरिका में ही लगाएं, क्योंकि अमेरिका के ट्रेडिंग पार्टनर्स उसके साथ सौतेला व्यवहार करते हैं। चीन अनुचित ढंग से 150 से 200 प्रतिशत का टैरिफ लगाता है और भारत 175 प्रतिशत।

टैरिफ पर भ्रामक दावों और आंकड़ों को लेकर ट्रंप पर उठे सवाल

जाहिर है यह झूठ है। वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, भारत की मानक औसत टैरिफ दर आम तौर से 10 से 12 प्रतिशत के करीब है। भारत कुछ अति विशिष्ट, एकल लक्जरी चीजों (जैसे आयातित शराब पर 150 प्रतिशत टैरिफ पर उच्च टैरिफ लगाता है, लेकिन ट्रंप का यह दावा पूर्णतः निराधार था कि भारत ने अमेरिकी सामान पर एकमुश्त 175 प्रतिशत टैरिफ लगाया हुआ है।

इसके बावजूद अमेरिकी ट्रेड डाटा के अधिकारियों सहित कोई भी ट्रंप को यह न समझा सका कि वह फेक डाटा प्रस्तुत कर रहे हैं। अमेरिका में अर्थशास्त्री अक्सर अपने प्रकाशित पेपर्स में सरकारी डाटा को चुनौती देते हैं, थिंक टैंक्स सरकारी डाटा की आलोचना करते हुए रिपोर्टस जारी करते हैं और सांसद इन्हें समझने के लिए अध्ययन कमीशन बनाते हैं। लेकिन ट्रंप चौथे विकल्प का चयन करते हैं डाटा पर इतना चिल्लाओ कि वह बदल जाए।

ट्रंप के दावों पर सवाल, भ्रामक बयानों और तथ्यों को लेकर बढ़ी आलोचना

ट्रंप ने दावा किया था कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल के दौरान 25 मिलियन अवैध अप्रवासियों ने घुसपैठ की थी। अगर यह दावा सही होता तो अमेरिका की जनसंख्या 4 वर्ष में 8 प्रतिशत बढ़ जाती। ट्रंप ने यह दावा भी किया था कि उनकी नीतियों ने दवाओं की कीमत 600, 700 या 800 प्रतिशत कम की, जो कि असंभव है। बशर्ते कि फार्मा कंपनियां रोगियों को दवा सेवन के लिए स्वयं पैसे दें।

डोनाल्ड ट्रंप के बड़बोलेपन और फेक दावों को सूची बहुत लंबी है। ट्रंप ने दर्जनों बार दोहराया कि भारत-पाक युद्ध उन्होंने ट्रेड करने का लालच देकर रुकवाया। भारत इस दावे का खंडन करता है। दूसरा यह कि लगभग 3 माह चले ईरान युद्ध के दौरान ट्रंप ने अनेक बार दावा किया कि ईरान की नेवी, एयरफोर्स, मिसाइल पावर को पूर्णतः खत्म कर दिया गया है, लेकिन दुनिया ने एफ-35 विमानों को गिरते हुए देखा और ट्रंप ईरान की मर्जी के बिना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुलवा भी न सके।

मनमाने दावे करने की आदत

ट्रंप के बड़बोलेपन, विकृत दृष्टिकोण और फेक दावों का ही नतीजा है कि उनकी वैश्विक छवि निरंतर निचले पायदान की ओर गिरती जा रही है। प्यू रिसर्च सेंटर के 2026 ग्लोबल एटीट्यूड सर्वे में ट्रंप के बारे में जबरदस्त नकारात्मक राय सामने आई है कि मात्र 23 प्रतिशत वयस्कों को ही वर्ल्ड अफेयर्स के नेतृत्व में ट्रंप पर विश्वास है। 36 देशों के 74 प्रतिशत वयस्क ट्रंप की ईरान नीति से सहमत नहीं हैं। ट्रंप की टैरिफ नीतियां भी लोगों को पसंद नहीं हैं, खासकर उन देशों में जिनसे अमेरिका का व्यापार है। भारत में तो 82 प्रतिशत लोग इनके विरोध में हैं।

लेख-डॉ. अनिता राठौर के द्वारा

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