Bhagat Singh: मैं नास्तिक क्यों हूं, भगत सिंह ने जेल में लिखा लेख, जो आज भी युवाओं को करता हैं प्रेरित
Bhagat Singh Thoughts: जेल की कोठरी में लिखा गया भगत सिंह का लेख "मैं नास्तिक क्यों हूं" आज भी क्यों चर्चा में है? जानें इस ऐतिहासिक लेख के पीछे की पूरी कहानी और उनके क्रांतिकारी विचार।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब में हुआ था। वे सिर्फ बंदूक उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि गहरे पाठक, पत्रकार और विचारक भी थे, जो जेल में भी किताबों और कलम के साथ जुड़े रहे।source: Pinterest
लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई के दौरान वे लाहौर सेंट्रल जेल में बंद थे। इसी जेल में उन्होंने दो साल के भीतर खूब पढ़ा और लिखा, और यहीं से उनकी वैचारिक परिपक्वता सामने आई।source: Pinterest
4 अक्टूबर 1930 को गदर पार्टी से जुड़े धार्मिक स्वभाव के बाबा रणधीर सिंह उनसे जेल में मिले। उन्होंने भगत सिंह को ईश्वर में आस्था की ओर लाने की कोशिश की और कहा कि शोहरत के घमंड ने उन्हें भगवान से दूर कर दिया है।source: Pinterest
इस आरोप का जवाब देने के लिए भगत सिंह ने 5 और 6 अक्टूबर 1930 को यह लेख लिखा। इसका मकसद अपने अविश्वास को घमंड की उपज मानने वाली सोच को तर्क के साथ चुनौती देना था।source: Pinterest
लेख में उन्होंने साफ कहा कि उनकी नास्तिकता अहंकार से नहीं, बल्कि सोच-समझ और तर्क से पैदा हुई है। उनके अनुसार अपनी मान्यताओं पर टिके रहने की ताकत को घमंड कह देना आसान है, पर यह जरूरी नहीं कि सही हो।source: Pinterest
भगत सिंह ने अपने लेख में गरीबी, शोषण और अन्याय को देखकर सवाल उठाए कि अगर कोई सर्वशक्तिमान सत्ता है, तो दुनिया में इतना कष्ट क्यों है। इन्हीं तर्कों के आधार पर उन्होंने अपना पक्ष रखा।source: Pinterest
वे मार्क्स, लेनिन और बाकुनिन जैसे विचारकों को पढ़ते थे। इस अध्ययन ने उन्हें वैज्ञानिक और तर्कसंगत सोच की ओर बढ़ाया और उनके क्रांतिकारी विचारों को गहराई दी।source: Pinterest
उन्होंने माना कि कठिन समय में आस्था इंसान को सहारा दे सकती है, लेकिन उनका मत था कि मुश्किल के वक्त भी इंसान को अपने पैरों पर खड़ा रहना और साहस के साथ हालात का सामना करना चाहिए।source: Pinterest
7 अक्टूबर 1930 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई और 23 मार्च 1931 को राजगुरु और सुखदेव के साथ उन्हें फांसी दे दी गई। उनके निधन के बाद 27 सितंबर 1931 को यह लेख लाला लाजपत राय के अंग्रेजी साप्ताहिक "द पीपल" में प्रकाशित हुआ।source: Pinterest