Peaceful Protest Constitutional Right: उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में इस बात की पुष्टि की है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना छात्रों का संवैधानिक अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 19 में नागरिकों को भाषण, अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने की गारंटी दी गई है। यह उनका मूलाधिकार है। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने सरकार व नागरिकों को संवैधानिक प्रावधान के प्रति जागरूक किया है।
नीट पेपर लीक और परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ छात्रों के आंदोलन को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी सार्वजनिक आंदोलन पुलिस को ज्यादती करने का लाइसेंस नहीं देता। इसी प्रकार कानून लागू करने के खिलाफ होने वाली हिंसा को भी माफ नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का यह अभिमत सामयिक और संतुलित है। लोकतंत्र हर किसी से संयम की अपेक्षा करता है।
अभिव्यक्ति का मूलाधिकार केवल शोभा के लिए या प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से जनता सरकार को जवाबदेही के लिए बाध्य कर सकती है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो छात्र आंदोलनों की वजह से संस्थागत सुधार आए हैं।
जब युवा नागरिक अपनी समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो लोकतांत्रिक सरकार का पहला कदम चर्चा या संवाद करना होना चाहिए, बल प्रयोग करना नहीं। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश किसी एक आंदोलन या शहर तक सीमित नहीं है। यह विरोध प्रदर्शनों का प्रबंधन करने के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल है। अभी तक स्पष्ट दिशा-निर्देश के अभाव में टकराव होता रहा है।
आंदोलनकारी पुलिस पर बर्बरता का आरोप लगाते हैं जबकि पुलिस कहती है कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ बैरिकेड हटाकर आगे आई और उसने पुलिसकर्मियों पर हमले किए। इन दोनों बातों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के समान ही पुलिस कर्मियों की सुरक्षा भी महत्व रखती है। धमकी या हिंसा के माध्यम से संवैधानिक अधिकार हासिल नहीं किए जा सकते। जो लोग किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन या आंदोलन में घुसपैठ कर हिंसा व अव्यवस्था को अंजाम देते हैं, उन्हें अलग कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
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अदालत के सामने यह बात आई है कि सुरक्षाबलों ने ताकत का असंतुलित इस्तेमाल किया और पैलेट गन जैसे हथियारों का भी उपयोग किया। इस अत्याचार की निष्पक्ष न्यायिक जांच आवश्यक है। केवल आरोपों से अपराध सिद्ध नहीं होता।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा