मनुस्मृति पर राहुल गांधी का वार, निशिकांत दुबे ने किया पलटवार; फिर चर्चा में आया आंबेडकर का विरोध

Manusmriti Controversy: राहुल गांधी के मनुस्मृति संबंधी बयान पर BJP सांसद निशिकांत दुबे ने प्रतिक्रिया देते हुए निशाना साधा है। विवाद के बीच आंबेडकर द्वारा मनुस्मृति दहन का इतिहास फिर चर्चा में आया।
Rahul Gandhi Manusmriti Controversy Nishikant Dubey
निशिकांत दुबे और राहुल गांधी(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nishikant Dubey Reply: लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने शनिवार को महिलाओं को देश की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए पितृसत्तात्मक सोच पर तीखा हमला किया।

पुणे में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में युवाओं और छात्राओं से संवाद करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि महिलाओं को दूसरों पर निर्भर बनाकर रखना 'मनुस्मृति की मानसिकता' का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि महिलाएं किसी की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि वे सिर्फ अपनी हैं और उन्हें अपने अधिकारों के लिए आगे आना चाहिए।

राहुल गांधी ने युवतियों से सामाजिक बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ने का आह्वान किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्राएं मौजूद थीं और कई छात्राओं ने मंच पर आकर अपनी व्यक्तिगत चुनौतियां, शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव और सुरक्षा से जुड़े अनुभव साझा किए। राहुल गांधी ने कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य राजनीति पर चर्चा करना नहीं, बल्कि युवाओं के विचारों और उनकी समस्याओं को समझना है।

मनुस्मृति पर निशिकांत दुबे का पलटवार

राहुल गांधी के बयान के बाद राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए राहुल गांधी पर पलटवार किया। दुबे ने वॉरेन हेस्टिंग्स के समय 1775 में संस्कृत और पाली ग्रंथों के अध्ययन एवं अनुवाद के लिए गठित समिति का उल्लेख करते हुए मनुस्मृति को लेकर कई ऐतिहासिक दावे किए।

उन्होंने कहा कि 1777 में प्रस्तुत रिपोर्ट में मनुस्मृति के कुछ श्लोकों को सही और कुछ को गलत बताया गया था तथा अलग-अलग विद्वानों द्वारा बाद में कुछ अंश जोड़े जाने की बात भी कही गई थी।

दुबे ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि सनातन धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मग्रंथों में भी ऐसे विचारों को देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत हिंदू, मुस्लिम और ईसाई सभी का देश है। इस बयान के बाद मनुस्मृति को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।

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समानता से बड़ा कोई विचार नहीं

इस पूरे विवाद में एक बात साफ है कि किसी भी ग्रंथ, परंपरा या विचार में अगर कोई बात गलत है और वह समानता, स्वतंत्रता या इंसानी गरिमा के खिलाफ जाती है, तो उसे गलत कहने में संकोच नहीं होना चाहिए।

बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि किसी विचार को किसने लिखा या किस दौर में लिखा, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 25 दिसंबर 1927 को महाड में मनुस्मृति दहन किया था। उनका यह कदम सामाजिक भेदभाव और जातिगत असमानता के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध था।

इसलिए आज मनुस्मृति पर बहस करते समय इतिहास, संविधान और सामाजिक समानता, तीनों पहलुओं को साथ रखकर चर्चा करना जरूरी है। सवाल किसी धर्म या समुदाय को निशाना बनाने का नहीं, बल्कि गलत को गलत कहने और समान अधिकारों की बात करने का है।

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