प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
नवभारत विशेष

संपादकीय: अब विद्युत वितरण का भी निजीकरण !

State Power Loss: मुफ्त बिजली योजनाओं और राजनीतिक दबाव से राज्यों की बिजली कंपनियां भारी घाटे में हैं। देशभर में बकाया 7.5 लाख करोड़ पार है। 16वें वित्त आयोग ने 80 DISCOM के निजीकरण की सिफारिश की है।

अंकिता पटेल

Electricity Distribution Debt: कर्ज के बोझ और बढ़ते घाटे को देखते हुए राज्यों की ८० विद्युत वितरण कंपनियों का निजीकरण करने की सिफारिश 16वें वित्त आयोग ने की है। चुनाव के मौके पर कुछ राज्यों में मुफ्त बिजली देने के वादे की वजह से विद्युत कंपनियों की दिक्कतें बढ़ी हैं। विद्युत दरों की समय-समय पर पुनर्रचना का राज्यों की ओर से विरोध किया जाता है।

इससे भी घाटा बढ़ता है। पंजाब में आम आदमी सरकार ने घरेलू ग्राहकों को 300 यूनिट तक बिजली मुफ्त कर दी है तथा किसानों को भी सुविधाएं दी हैं। इस वजह से पंजाब सरकार की बिजली कंपनी का घाटा बढ़ा है। घाटा बढ़ने से हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने तो अनेक सुविधाएं रद्द कर दी हैं। महाराष्ट्र में महावितरण कंपनी की हालत भी ठीक नहीं है।

महायुति ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में किसानों को मुफ्त चिजली का आश्वासन दिया था, इसलिए बड़े पैमाने पर किसानों ने बिजली बिल भरना बंद कर दिया। परिणाम स्वरूप महावितरण का बिजली बिल बकाया 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया। देश की विविध बिजली कंपनियों का बकाया साढ़े 7 लाख करोड़ से भी ज्यादा हो गया है।

इसमें महाराष्ट्र ज्यादा घाटे में है। विद्युत मंडलों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने 3 अलग-अलग पैकेज दिए, फिर भी हालत नहीं सुधरी। महावितरण कंपनी का कर्ज का बोझ 2023-24 के अंत में 84 हजार करोड़ रुपये था।

2018-19 में यह बोझ 35 हजार करोड़ था। 5 वर्षों में यह बोझ 49 हजार करोड़ रुपये बढ़ गया। इससे कंपनी की आर्थिक स्थिति गंभीर हो गई है। विविध समूहों को दी जाने वाली रियायत की रकम सरकार विद्युत कंपनी को हस्तांतरित नहीं कर रही।

इससे हालत बिगड़ रही है। ऐसे में विद्युत कंपनी का निजीकरण होने के आसार बढ़ गए हैं। जिन राज्यों में निजीकरण हुआ, वहां बिल वसूली बढ़ी व घाटा कम हुआ, ओडिशा में इसका लाभ मिला।

महाराष्ट्र के भिवंडी में निजी कंपनी को जिम्मेदारी देने से बिल वसूली में वृद्धि हुई लेकिन जनता की नाराजगी भी बढ़ी, संभाजीनगर व जलगांव में निजीकरण को सफलता नहीं मिली। यदि निजी कंपनी घाटा कम कर सकती है तो सरकारी मशीनरी ऐसा क्यों नहीं कर पाती ? इसके अनेक कारण हैं।

एक ओर तो वित्त आयोग ने बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण की सिफारिश की है वहीं दूसरी ओर गत सप्ताह संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया कि 2025-26 में पहली बार विद्युत कंपनियां फायदे में रही हैं। देश की सभी विद्युत कंपनियों को कुल 2700 करोड़ रुपये का लाभ हुआ है।

2014-15 में लगभग 70,000 करोड़ रुपये का घाटा था लेकिन 10 वर्षों में मुनाफा हुआ है। 10 वर्ष पहले विद्युत प्रेषण और वितरण का घाटा 22 प्रतिशत था। अब यह कम होकर 15 प्रतिशत पर आ गया है।

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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