वन नेशन वन इलेक्शन डिजाइन फोटो
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नवभारत निशानेबाज: देश में फिर चर्चा में आया वन नेशन वन इलेक्शन, होगा आसान या बढ़ेगी टेंशन

One Nation One Election: वन नेशन वन इलेक्शन को लेकर बहस फिर गर्म है। जानिए क्या एक साथ चुनाव होने से देश का पैसा और समय बचेगा, या फिर 5 साल के लिए बेफिक्र हो जाएंगे नेता?

आकाश मसने

Navabharat Nishanebaaz: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, इन दिनों फिर 'वन नेशन वन इलेक्शन' की चर्चा जोर पकड़ने लगी है। मुंबई में आयोजित राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस में 50 दिग्गजों ने इसका समर्थन किया। इस मुद्दे के समर्थकों का कहना है कि यदि एक ही बार में सारे देश के ग्रामपंचायत, जिला परिषद, नगरपालिका, मनपा, विधानसभाओं व लोकसभा के चुनाव निपट जाएं तो राजनीति में स्थिरता आ जाएगी।

नागरिक भी निश्चिंत हो जाएंगे। उन्हें बार-बार मतदान केंद्र जाकर लाइन लगाकर वोट डालने की झंझट से छुटकारा मिल जाएगा। प्रशासनिक मशीनरी और शिक्षकों को भी इससे तसल्ली होगी। सुरक्षाबलों को बार-बार तैनात नहीं करना पड़ेगा। 'वन नेशन वन इलेक्शन' का मतलब है तुरंत दान महापुण्य!'

हमने कहा, 'भाई चुन्नीलाल, चुनाव लोकतंत्र का पर्व या त्योहार होता है। जब हम सालभर कोई न कोई त्योहार मनाते हैं तो चुनाव भी उत्साहपूर्वक बार-बार कराते रहना चाहिए। इससे राजनीति का चक्र चलायमान रहता है। नेता भी सक्रिय बने रहते हैं। चुनाव सभाओं या रैलियों का इंतजाम करने वालों और किराए की भीड़ लाकर मैदान भरने वालों को रोजगार मिलता है। कार्यकर्ताओं को बार-बार खर्च-पानी के लिए रकम मिलती है।

नेताओं को बार-बार गला फाड़कर भाषण देने और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का चान्स मिलता है। टीवी पर विभिन्न पार्टियों के प्रवक्ताओं को भड़ास निकालने का अवसर हासिल होता है। हर चुनाव में जनता के टैक्स की रकम से मुफ्त की खैरात बांटने वाली घोषणाएं होती हैं। यदि एक बार में ही सारे चुनाव करा लिए तो इन लोगों का क्या होगा?'

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, 'एक राष्ट्र एक चुनाव' से खर्च बचेगा। लोग गया जाकर इसलिए श्राद्ध करते हैं कि एक बार में ही पितरों को मुक्ति मिल जाए। मतदाता भी एक बार वोटिंग करने के बाद 5 साल तक टेंशन फ्री हो जाएंगे। हर साल किसी न किसी चुनाव में उंगली पर स्याही लगाने और ईवीएम की बटन दबाने से छुटकारा मिलेगा।'

हमने कहा, 'यदि एक बार किसी पार्टी की सत्ता आ गई तो वह पूरे 5 साल मनमानी करेगी। उसे अविश्वास प्रस्ताव लाकर गिराने का चान्स नहीं रहेगा क्योंकि अगला चुनाव तो 5 साल बाद ही कराया जाएगा।

उद्योगपतियों के सहयोग वाली बड़ी पार्टियों के चुनाव प्रचार का बुलडोजर उन अल्प साधनों वाली छोटी पार्टियों को रौंद देगा, जो एकसाथ देशव्यापी चुनाव का खर्च नहीं उठा सकतीं। विपक्ष कितना ही चिल्लाए, सरकार अंगद के समान पैर जमाकर टिकी रहेगी और टस से मस नहीं होगी!'

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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