Maharashtra Anti Conversion Bill Provisions: सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने अपने असहमति नोट में लिखा कि इस विधेयक को चंद ही दिन में पारित कर दिया गया, जिससे जनता को इस पर विचार करने या लेजिस्लेटिव स्क्रूटिनी के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला। महाराष्ट्र का धार्मिक स्वतंत्रता कानून जबरन, फ्रॉड, धोखाधड़ी, लालच या विवाह से कराए गए अवैध धर्मांतरण को प्रतिबंधित करता है और इसे गैर-जमानती अपराध बनाता है।
उल्लंघन करने वाले के लिए 3 से 10 वर्ष तक की सजा और 7 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। जो लोग अपनी इच्छा से अपना धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं, उन्हें 60 दिन पहले जिलाधिकारी को नोटिस देना होगा और धर्म परिवर्तन के 21 दिन के भीतर उसे रिपोर्ट करना होगा। धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति या इसमें सहयोग करने वाले व्यक्ति को ही साबित करना होगा कि धर्मातरण स्वतंत्र इच्छा से किया गया है। अगर विवाह केवल अवैध धर्मांतरण के लिए किया गया है, तो अदालतें ऐसी शादी को अवैध व शून्य घोषित कर सकती हैं।
ऐसी शादी से उत्पन्न संतान का धर्म वही माना जाएगा जो शादी से पहले मां का धर्म था। सामान्य अपराध में 7 वर्ष तक की कैद और 1 लाख रुपये का जुर्माना है। अगर अपराध में नाबालिग, महिलाएं, कमजोर दिमाग के व्यक्ति या अनुसूचित जाति (एससी) व अनुसूचित जनजाति (एसटी) के सदस्य शामिल हैं, तो 7 वर्ष तक की कैद व 5 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। सामूहिक धर्मांतरण में भी यही सजा व जुर्माना है। लेकिन जो व्यक्ति बार-बार यह अपराध करता है तो उसे 10 साल तक की कैद व 7 लाख रुपये का जुर्माना अदा करना पड़ सकता है। सिविल राइट्स ग्रुप्स का तर्क है कि यह कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करता है।
नोटिफिकेशन नियम अंतर-धार्मिक जोड़ों को निशाना बनाएंगे और चयन की आजादी को सीमित करेंगे। महाराष्ट्र का यह 'धर्म की स्वतंत्रता' कानून कहता है कि पैसा, उपहार, रोजगार, शिक्षा, शादी का वायदा, जीने की बेहतर स्थितियां उपलब्ध कराने का आश्वासन या दैविक उपचार के दावे अवैध लालच होंगे, अगर उनका संबंध धर्मांतरण से है।
महाराष्ट्र राज्य के कानून में व्यक्तिगत स्वतंत्रता में सबसे चिंताजनक हस्तक्षेप यह है कि धर्मांतरण से 60 दिन पहले जिलाधिकारी को नोटिस आवश्यक रूप से देना है। सरकारी अधिकारी यह जांच करेंगे कि व्यक्ति ने यह फैसला क्यों लिया? संविधान द्वारा दी गई आजादी की गारंटी सरकारी कर्मचारियों पर निर्भर नहीं हो सकती। किसी धर्म में आस्था रखना, उसे ठुकराना, उसे अपनाना या बदलने का अधिकार संविधान ने इस शर्त के साथ नहीं दिया है कि इसके लिए सरकारी मंजूरी ली जाए।
कानून में यह अनुमति दी गई है कि अंतर-धार्मिक संबंध में शामिल व्यक्तियों के खिलाफ उनके रिश्तेदार, जिनमें पैरेंट्स व भाई-बहन भी शामिल हैं, शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि जो वयस्क अपनी मर्जी से साथ हैं, उनका व्यक्तिगत संबंध केवल इसलिए पुलिस जांच के दायरे में आ जाता है कि परिवार के किसी सदस्य ने उनकी पसंद पर आपत्ति की है।
-लेख शाहिद ए चौधरी द्वारा