

India-Bangladesh Row: भारत और बांग्लादेश के रिश्ते इस समय कई अहम मुद्दों लेकर उलझे हुए हैं। सबसे बड़ा विवाद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को लेकर है, जो अगस्त 2024 में छात्र आंदोलनों के बाद हुए तख्तापलट के बाद से भारत में रह रही थी। बांग्लादेश की मौजूदा सरकार लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रही है। माना जा रहा है कि हसीना के बांग्लादेश पहुंचते ही उन्हें जेल डाल दिया जाएगा। इसके चलते भारत उनके प्रत्यर्पण को थोड़ा असहज है
हालांकि, इसी बीच खुद शेख हसीना ने इस साल के अंत में बांग्लादेश वापस जाने की बात कही है। इससे बांग्लादेश में सियासी हलचल एक बार फिर तेज हो गई है। साथ ही इसका असर बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा पर भी दिखाई दे रहा है। ढाका ने संकेत दिया है कि जब तक शेख हसीना के मुद्दे पर पर्याप्त प्रगति नहीं होती, तब तक रहमान की भारत यात्रा के लिए माहौल अनुकूल नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव आता है दोनों में से किसका नुकसान अधिक होगा? शेख हसीना की वापसी को बांग्लादेश की राजनीति में क्या पक रहा है? हसीना के अलावा वो कौन से मुद्दे हैं जिनपर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है?
बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में भी शेख हसीना की वापसी को लेकर रुख बदलता दिखाई दे रहा है। हसीना ने दिसंबर 2026 तक देश लौटने की इच्छा जताई है। उनके इस बयान के बाद अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। जमात-ए-इस्लामी के नेताओं की ओर से भी संकेत मिले हैं कि अगर आवामी लीग भविष्य में राजनीति में लौटती है तो उसे लेकर बातचीत की गुंजाइश हो सकती है। इससे पता चलता है कि हसीना का मुद्दा अब केवल भारत-बांग्लादेश विवाद नहीं, बल्कि बांग्लादेश की घरेलू राजनीति का भी बड़ा सवाल बन गया है।
तारिक रहमान के लिए भारत यात्रा का सवाल इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि बांग्लादेश में भारत को लेकर राजनीतिक भावनाएं पिछले दो वर्षों में बदली हैं। 2024 के आंदोलन के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव बढ़ा। नई राजनीतिक ताकतों ने भारत की भूमिका और शेख हसीना को भारत में शरण मिलने पर सवाल उठाए। ऐसे माहौल में रहमान के लिए भारत का दौरा केवल कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति से जुड़ा फैसला भी बन गया है।
भारत ने नई बांग्लादेशी सरकार के साथ संपर्क बनाए रखने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से तारिक रहमान को बधाई और भारत आने का निमंत्रण भी इसी दिशा में देखा गया। हालांकि, ढाका ने हाल में कहा है कि प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के लिए बेहतर राजनीतिक और कूटनीतिक माहौल जरूरी है। इस बीच शेख हसीना के बयानों और प्रत्यर्पण के सवाल ने दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की प्रक्रिया को मुश्किल बना दिया है।
इस विवाद में एक और मामला भी महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश भारत से उन आरोपियों को वापस मांग रहा है, जिन पर पिछले साल नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या में शामिल होने का आरोप है। ढाका का मानना है कि भारत में मौजूद आरोपियों को वापस लाकर मामले की जांच और कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाई जानी चाहिए। इस तरह शेख हसीना के प्रत्यर्पण के साथ-साथ अपराध और सुरक्षा से जुड़े मामलों ने भी दोनों देशों के बीच बातचीत को और जटिल बना दिया है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों का सबसे बड़ा और लंबी अवधि वाला मुद्दा गंगा जल संधि है। 12 दिसंबर 1996 को हुई यह संधि फरक्का बैराज पर गंगा के पानी के बंटवारे से जुड़ी है और इसकी 30 साल की अवधि दिसंबर 2026 में पूरी हो रही है। भारत सरकार ने संसद में बताया है कि संधि की अवधि खत्म होने वाली है, लेकिन फरवरी 2026 तक दोनों देशों के बीच इसके नवीनीकरण पर औपचारिक बातचीत शुरू नहीं हुई थी।
अब बिहार से इस संधि को लेकर विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं। जेडीयू के राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा ने केंद्र से मौजूदा समझौते को बिना बदलाव के आगे नहीं बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि बिहार की भविष्य की पानी की जरूरतों, सिंचाई और बाढ़ जैसी समस्याओं को ध्यान में रखकर नई व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। जेडीयू ने संकेत दिया है कि बिहार के हितों की रक्षा किए बिना संधि के नवीनीकरण का विरोध किया जाएगा।
गंगा जल संधि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब पानी केवल पर्यावरण या कृषि का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि दोनों देशों की कूटनीति का हिस्सा बन गया है। विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण गंगा के जल प्रवाह और पानी की उपलब्धता के पुराने आंकड़ों पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में 2026 का नवीनीकरण केवल पुरानी संधि को आगे बढ़ाने के बजाय नई परिस्थितियों के अनुसार नियम तय करने का अवसर बन सकता है।
इस बीच बांग्लादेश की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव हुआ है। 20 अगस्त को बीएनपी के वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर देश के राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने जमात-समर्थित उम्मीदवार ओली अहमद को 255 के मुकाबले 88 वोटों से हराया। यह बदलाव तारिक रहमान की सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा पर भी इसका असर पड़ सकता है।
भारत-बांग्लादेश व्यापार में भारत का निर्यात बांग्लादेश को होने वाले आयात से काफी ज्यादा है। ऐसे में सीमा बंद होने और व्यापार रुकने की स्थिति में बांग्लादेश को कच्चे माल, ऊर्जा, मशीनरी और अन्य औद्योगिक सामान की कमी का सामना करना पड़ सकता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी, उद्योग प्रभावित होंगे और रोजगार पर दबाव आएगा।
दूसरी ओर, भारत को भी नुकसान होगा। पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के सीमा कारोबार, बांग्लादेश को होने वाला निर्यात, ट्रांसपोर्ट-लॉजिस्टिक्स, निवेश और पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, बड़ी और विविध अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत के लिए वैकल्पिक बाजार और आपूर्ति स्रोत तलाशना अपेक्षाकृत आसान होगा। हालांकि फिलहाल दोनों देश बातचीत के जरिए सभी मुद्दों का हल निकालने की कोशिश को तरजीह देते नजर आ रहे हैं।