

Supreme Court PIL Under Article 21A: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत 'खेल के अधिकार' को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता डॉ. कनिष्क पांडे ने कोर्ट से कहा कि खेल के अधिकार से जुड़े इस बड़े संवैधानिक मुद्दे को सिर्फ 'फिजिकल लिटरेसी' तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मांग को सराहनीय बताते हुए कहा, 'ये बेहद जरूरी है। अब इस डिजिटल युग में बच्चे खेल के मैदानों से पूरी तरह दूर होते जा रहे हैं।'
कनिष्क पांडे की ओर से दायर पीआईएल में खेल को संवैधानिक मान्यता देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि बच्चों और नागरिकों के सर्वांगीण विकास के लिए खेलों में हिस्सा लेना जरूरी है। इसे केवल व्यक्तिगत पसंद, संस्थानों की इच्छा या प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
याचिका दायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अदालत की मदद के लिए एक 'एमिकस क्यूरी' नियुक्त किया। बाद में कोर्ट के सामने एक रिपोर्ट भी पेश की गई। हालांकि, याचिकाकर्ता ने रिपोर्ट के कुछ अहम हिस्सों पर आपत्ति जताई।
खेल और फिजिकल लिटरेसी एक नहीं
याचिकाकर्ता ने खास तौर पर रिपोर्ट में फिजिकल लिटरेसी पर ज्यादा ध्यान दिए जाने पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि खेल, शारीरिक शिक्षा और फिजिकल लिटरेसी तीन अलग-अलग अवधारणाएं हैं और इन्हें एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि अगर खेल के अधिकार की जगह फिजिकल लिटरेसी को रखा जाता है, तो पीआईएल का मूल उद्देश्य और उसका दायरा बदल जाएगा। याचिकाकर्ता ने ये भी तर्क दिया कि खेलों को सिर्फ मेडल, प्रतियोगिता, बेहतरीन खेल प्रदर्शन या चैंपियन बनने के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
याचिका के अनुसार, खेल का सामाजिक और विकास से जुड़ा पहलू भी बहुत बड़ा है। खेल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास, अनुशासन, नेतृत्व, आत्मविश्वास, मुश्किल परिस्थितियों से उबरने की क्षमता, टीम वर्क और चरित्र निर्माण में मदद करता है।
इसके अलावा खेल तनाव और नकारात्मकता को कम करने, सामाजिक अलगाव दूर करने और मजबूत समुदाय बनाने में भी अहम भूमिका निभा सकता है। इससे लोगों के बीच मेलजोल, समावेश और एकजुटता को बढ़ावा मिलता है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, खेल एक साथ शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, युवा विकास, सामुदायिक निर्माण, सामाजिक विकास और राष्ट्र निर्माण का जरिया बन सकता है।
स्क्रीन टाइम बढ़ने के बीच खेल के अधिकार की मांग
याचिकाकर्ता ने बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि जब बच्चे खेल के मैदानों से दूर होकर स्क्रीन की तरफ बढ़ रहे हैं, तब खेल तक पहुंच को मान्यता देना और भी जरूरी हो जाता है। उनके मुताबिक, खेल के अधिकार का मकसद ये सुनिश्चित करना है कि खेलने का मौका केवल कुछ खास बच्चों या वर्गों तक सीमित न रहे।