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नवभारत विशेष: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर खतरा, पत्रकारों की हत्या और गिरफ्तारी के आंकड़े चिंताजनक

Global Press Freedom Crisis: 2025 में दुनिया भर में 129 पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की हत्या हुई, जबकि साल के अंत में 330 पत्रकार जेलों में बंद थे। ये आंकड़े पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल उठाते हैं।

अंकिता पटेल

Highlights

  • पत्रकारों को हत्या, गिरफ्तारी, अपहरण, धमकी और डिजिटल उत्पीड़न जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

  • सीपीजे की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में दुनिया भर में 129 पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की हत्या हुई।

  • इनमें 47 हत्याएं पत्रकारिता के काम के कारण सुनियोजित तरीके से की गईं।

  • वर्ष 2025 के अंत में दुनिया के 330 पत्रकार जेलों में बंद थे। लगातार पांचवें साल यह संख्या 300 से अधिक रही।

Journalist Killings and Imprisonment Worldwide: पत्रकारिता को 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' कहा जाता है। लेकिन इस स्तंभ को मजबूत बनाने वाले पत्रकार आज खुद कितने सुरक्षित हैं? दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से पत्रकारों की हत्या, गिरफ्तारी, अपहरण, धमकी, शारीरिक हमले और डिजिटल उत्पीड़न की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। भारत सहित अनेक लोकतांत्रिक देशों में पत्रकारों को राजनीतिक दबाव, भीड़ की हिंसा, कानूनी कार्रवाई की धमकी और सोशल मीडिया पर संगठित ढंग से बदनाम करने के अभियानों का सामना करना पड़ रहा है।

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) की फरवरी 2026 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया भर में 129 पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की हत्या हुई। इनमें तीन-चौथाई से अधिक मौतें युद्धग्रस्त क्षेत्रों में हुई।

2025 में पत्रकारों की 47 ऐसी हत्याएं दर्ज कीं, जिन्हें उनके काम के कारण की गई सुनियोजित हत्याओं की श्रेणी में रखा गया। गाजा में पत्रकारों की मौत और ड्रोन हमलों का इस्तेमाल इस संकट के भयावह आयाम को सामने लाता है। सीपीजे की 21 जनवरी 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 के अंत में दुनिया भर में 330 पत्रकार जेलों में बंद थे। लगातार पांचवें साल जेल में बंद पत्रकारों की संख्या 300 से अधिक रही। इनमें लगभग आधे ऐसे थे जिन्हें अब तक सजा भी नहीं सुनाई गई थी। एक तिहाई से अधिक पत्रकार 5 साल से ज्यादा की कैद काट रहे थे।

पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल, भारत से अमेरिका तक बढ़ती चुनौतियां

यूनेस्को के आंकड़े भी इस संकट की गवाही देते हैं। वर्ष 2024 और 2025 में पत्रकारों पर हिंसक हमलों में 189 पत्रकार मारे गए। इनमें 67 प्रतिशत मौतें संघर्ष वाले क्षेत्रों में हुई। अमेरिका को एक समय प्रेस की स्वतंत्रता का समर्थक लोकतंत्र माना जाता था, लेकिन आज वहां भी पत्रकारों के सामने खतरे बढ़े हैं। सीपीजे के 28 अक्टूबर 2026 के विश्लेषण के मुताबिक, वर्ष 2026 की शुरुआत से अमेरिका में पत्रकारों के खिलाफ प्रेस स्वतंत्रता उल्लंघन की 166 घटनाएं दर्ज की गई थीं।

इनमें गिरफ्तारियां, शारीरिक हमले और पत्रकारिता से संबंधित समन जारी किए जाने जैसी घटनाएं शामिल थीं। पत्रकारों के सामने खतरा केवल किसी हमलावर की गोली या लाठी भर का नहीं है। सरकारी संस्थानों तक पहुंच रोकना, प्रतिकूल खबरों के कारण कानूनी कार्रवाई की धमकी देना, स्रोत उजागर करने के लिए दबाव बनाना और ऑनलाइन निगरानी भी पत्रकारिता को प्रभावित कर रहे हैं।

43 पत्रकार हिरासत में, पुलिस की कार्रवाई पर सवाल

भारत में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर अक्टूबर 2026 की एक घटना विशेष रूप से चिंताजनक है। 10 और 11 अक्टूबर को कम से कम 43 पत्रकारों को अस्थायी रूप से हिरासत में लिया गया। इनमें 39 पत्रकार दिल्ली में थे, जबकि अन्य पत्रकार अहमदाबाद, पुणे और मुंबई में हिरासत में लिए गए। कुछ पत्रकारों के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार की शिकायतें भी सामने आई।

इस दौरान पत्रकारों को प्रेस कार्ड दिखाने के बावजूद बसों में घसीटकर ले जाने, धक्का देने और उनके मोबाइल फोन तथा कैमरे जब्त करने की एक नहीं, कई घटनाएं सामने आई। कम से कम 5 पत्रकारों ने मीडिया के सामने आकर खुद को चोट लगने की जानकारी दी। ये घटनाएं पत्रकारों के पेशेवर अधिकारों और पुलिस की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को चुनौती

महिला पत्रकारों के लिए खतरा और भी व्यापक है। उन्हें पेशेवर चुनौतियों के अलावा लैंगिक टिप्पणियों, चरित्र हनन, ऑनलाइन धमकियों, अश्लील संदेशों और निजी जानकारियां सार्वजनिक करने जैसे हमलों का सामना करना पड़ता है।

75 प्रतिशत महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन हिंसा का सामना करने की बात कही। सर्वेक्षण में लगभग एक-चौथाई महिलाओं को शारीरिक हमले या जान से मारने की धमकी मिलने की जानकारी सामने आई। डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए तैयार की गई आपत्तिजनक सामग्री ने इस खतरे को और जटिल बना दिया है।

लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा

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