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RSF की प्रेस स्वतंत्रता रिपोर्ट: पश्चिम का शोर या भारतीय लोकतंत्र की अधूरी तस्वीर
- Written By: नवभारत डेस्क | Edited By: मनोज आर्या
Reporters Without Borders (RSF) की सालाना रिपोर्ट पर भरोसा करने से पहले एक बुनियादी सवाल है कि यह बनती कैसे है? किसके पैसे से, किसकी कलम से और किस एजेंडे के लिए?

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस, (सोर्स- सोशल मीडिया)
World Press Freedom Day: हर साल 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर पेरिस की एक NGO ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी करती है, और भारत का नाम 150 के नीचे कहीं न कहीं दबा मिलता है। 2026 की ताजा रिपोर्ट में भारत 157वें स्थान पर है। 2025 में भी 157वां, 2024 में 159वां स्थान था। इस रिपोर्ट के आते ही देश का एक तबका मातम मनाने लगता है। “लोकतंत्र खतरे में है! पत्रकारिता मर रही है! प्रेस पर शिकंजा कस दिया गया है!” लेकिन इस वार्षिक विलाप के बीच एक बुनियादी सवाल कोई नहीं पूछता कि यह सूचकांक बनता कैसे है? भारत इसमें हमेशा पीछे क्यों रहता है? क्या इसके पीछे कोई वैश्विक तंत्र काम करता है? इ
न सवालों का जवाब तलाशने के लिए रिपोर्ट के बनने से लेकर जारी होने तक की पूरी प्रक्रिया को बारीकी से समझना होगा। रिपोर्ट तैयार करने का पैमाना क्या है? इसे कौन बनाता है? और इस संस्था को फंडिंग कहां से मिलती है? इन्हीं सवालों के धागे को पकड़कर आगे बढ़ना होगा।
फंडिंग की पारदर्शिता पर सवाल
दरअसल, ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ एक फ्रांसीसी NGO है जिसकी फंडिंग के स्रोत पूरी तरह पारदर्शी नहीं हैं। यूरोपीय सरकारें और कुछ निजी फाउंडेशन इसे वित्तपोषित करते हैं, बावजूद इसके यह संस्था खुद को ‘नॉन-प्रॉफिट’ बताती है। इसका ‘प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ मुख्यतः सर्वे, धारणाओं और चुनिंदा केस स्टडीज़ पर टिका है। यह कोई वस्तुनिष्ठ वैज्ञानिक माप नहीं, बल्कि कुछ चुने हुए लोगों की राय का संकलन है और वह राय भी पश्चिमी उदारवादी मूल्यों को ‘सही पत्रकारिता’ का एकमात्र पैमाना मानकर तय की जाती है।
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यहीं से एक सीधा और असुविधाजनक सवाल उठता है कि 140 करोड़ की आबादी, दर्जनों भाषाएं, सैकड़ों संस्कृतियां और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र क्या इस विशाल और जटिल देश की प्रेस स्वतंत्रता को पेरिस की किसी गली में बैठा एक NGO, कुछ गिने-चुने पत्रकारों से प्रश्नावली भरवाकर तय कर सकता है? भारत की प्रेस स्वतंत्रता का मूल्यांकन भारत के संविधान, भारत की न्यायपालिका और यहां के नागरिकों का अधिकार है किसी विदेशी संस्था का नहीं।
पाक-बांग्लादेश को भारत से बेहतर स्थान
RSF की रिपोर्ट का सबसे बड़ा विरोधाभास यह देखने को मिलता है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश को भारत से बेहतर स्थान दिया जाता है। यह दावा न केवल हास्यास्पद है, बल्कि पूरी रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगाता है। पाकिस्तान में जहाँ ISI के इशारे पर पत्रकार रातोंरात गायब हो जाते हैं। जहाँ फौज की आलोचना करते ही चैनल बंद हो जाते हैं। जहाँ वरिष्ठ पत्रकार अरशद शरीफ को जान बचाने के लिए देश छोड़ना पड़ा और अंततः गोली खानी पड़ी। RSF की नजर में यह देश भारत से ज्यादा ‘प्रेस फ्रेंडली’ है। बांग्लादेश जहाँ शेख हसीना सरकार के दौर में डिजिटल सिक्योरिटी एक्ट के जरिए सैकड़ों पत्रकारों पर मुकदमे ठोके गए। वहाँ की पत्रकारिता भारत से ज्यादा आजाद है? जब कोई रिपोर्ट इतनी बुनियादी जमीनी सच्चाई से कटी हो, तो उसे स्वीकार करना विनम्रता नहीं बौद्धिक आत्मसमर्पण होगा।
जो लोग इस रिपोर्ट को ‘सत्य का आईना’ मानते हैं, उन्हें कुछ और तथ्यों पर भी गौर करना चाहिए। अमेरिका में जहाँ Julian Assange को महज सूचना प्रकाशित करने के लिए वर्षों तक कानूनी शिकंजे में रखा गया। जहाँ ट्रंप ने मुख्यधारा के मीडिया को खुलेआम ‘एनिमी ऑफ द पीपल’ कहा। जर्मनी में जहाँ कुछ विचारों की अभिव्यक्ति पर कानूनी प्रतिबंध है। रूस और चीन में मीडिया पर राज्य का शिकंजा किसी से छिपा नहीं। फिर भी RSF की रैंकिंग में इन देशों की तस्वीर उतनी धुंधली नहीं दिखती, जितनी होनी चाहिए। यह महज संयोग नहीं है। यह सूचकांक भू-राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं है। पश्चिमी गठबंधन के करीबी देशों को अनुकूल रैंकिंग मिलती है और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने वाले देशों को दंड।
दुनियाभर में 128 पत्रकारों की हत्या
भारत में पत्रकारिता की वास्तविक तस्वीर देखने से पहले एक वैश्विक संदर्भ को भी समझना जरूरी है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (IFJ) के अनुसार 2025 में दुनियाभर में 128 पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की हत्या हुई। इनमें से 74 अकेले मध्य-पूर्व में सिर्फ फिलिस्तीन में 56, यमन में 13, यूक्रेन में 8, सूडान में 6, पाकिस्तान, मैक्सिको और फिलीपींस में तीन-तीन। वहीं भारत में 4। चार हत्याएं भी ज्यादा हैं। हर मौत एक त्रासदी है। जब भारत में पत्रकारों पर हमले होते हैं, तो भारतीय न्यायपालिका और सरकार चुप नहीं बैठती। अदालतें संज्ञान लेती हैं, जांच होती है, मुकदमे चलते हैं। लेकिन इसी IFJ के आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान में भी तीन पत्रकार मारे गए और RSF की रैंकिंग में पाकिस्तान भारत से ऊपर है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह सूचकांक नाप क्या रहा है।
अब भारत की जमीनी तस्वीर देखिए। यहां 900 से अधिक सैटेलाइट चैनल, 17,000 से अधिक पंजीकृत समाचारपत्र, लाखों डिजिटल पोर्टल। द वायर, NDTV, द क्विंट, न्यूजलॉन्ड्री, स्क्रॉल ये सब प्रतिदिन सरकार की तीखी आलोचना करते हैं और बिना किसी रुकावट के चल रहे हैं। संसद में विपक्ष बोलता है, अदालतें सरकार के खिलाफ फैसले सुनाती हैं, सोशल मीडिया पर हर रोज लाखों लोग बेखौफ अपनी बात रखते हैं। यदि प्रेस की आजादी सच में इतनी खतरे में होती तो क्या यह संभव था? लेकिन भारतीय पत्रकारिता का एक असली संकट भी है, जिसकी चर्चा RSF की रिपोर्ट में नहीं होता। वह संकट सरकारी दमन नहीं, बल्कि पत्रकारिता के नाम पर फैला वह अराजक तंत्र है जो हर शहर और कस्बे तक पहुंच चुका है।
बिना किसी प्रशिक्षण के कोई गली का अखाबार, पोर्टल, यूट्यूब चैनल चलाकर लोग ‘पत्रकार’ बन जाते हैं और उगाही का धंधा करने लगते हैं। सरकारी संस्थानों से मोटा विज्ञापन की मांग करते हैं, लेकिन जब विज्ञापन के नाम पर रकम नहीं मिलती तो यही स्वघोषित पत्रकार सरकार और सिस्टम के खिलाफ हो जाते हैं। यही तबका जब RSF जैसी संस्थाओं के सर्वे में भाग लेता है, तो हर चीज को ‘दमन’ की भाषा में बयान करता है। नतीजा रैंकिंग नीचे खिसकती है, और पेरिस में बैठे लोग उसे ‘सत्य’ मान लेते हैं।
RSF की निष्पक्षता पर सवाल
RSF की निष्पक्षता पर सवाल केवल भारत नहीं उठाता। The Guardian ने इसके वित्तीय स्रोतों पर सवाल उठाए हैं। The Colgate Maroon-News और Global Times ने इसे पश्चिमी प्रभाव का औजार बताया है। यहाँ तक कि Encyclopaedia Britannica में भी विशेषकर क्यूबा और लैटिन अमेरिका के संदर्भ में इस पर ‘Bias’ के आरोपों का उल्लेख है। हम भी यह कह रहे कि ये आरोप हैं, अंतिम निर्णय नहीं। लेकिन इनकी मौजूदगी एक जरूरी संकेत देती है कि किसी भी वैश्विक सूचकांक को आँखें मूँदकर स्वीकार करना बौद्धिक कमजोरी है।
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RSF का सूचकांक एक संकेतक है, एक संदर्भ बिंदु लेकिन अंतिम सत्य नहीं है, और इसे पूरी तरह खारिज कर देना भी उतना ही अनुचित होगा जितना की पूरी तरह से स्वीकार कर लेना। सच यह है कि भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और बहुभाषी लोकतंत्र में प्रेस स्वतंत्रता का मूल्यांकन किसी एक प्रश्नावली से नहीं हो सकता। इसके लिए चाहिए एक बहुआयामी दृष्टि, जहाँ वैश्विक सूचकांक, स्थानीय यथार्थ और संस्थागत अनुभव तीनों को बराबर की जगह मिले।
डॉ. पंकज सोनी
(लेखक जनसंपर्क विभाग भोपाल में
सहायक मीडिया सलाहकार हैं।)
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