भारतीय अर्थव्यवस्था, महंगाई संकट,(सोर्स: सोशल मीडिया) 
नवभारत विशेष

नवभारत संपादकीय: निर्माण से रोजगार तक संकट? भारत को आर्थिक संकट खुद हल करना होगा

India Economic Crisis: निर्माण, रोजगार, निर्यात और ईंधन कीमतों को लेकर भारत की आर्थिक स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं। पेट्रोल-डीजल कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

अंकिता पटेल

Fuel Price Hike Manufacturing Sector: भारत का आर्थिक संकट निर्माण, निर्यात और घरेलू वित्तीय स्थिति जैसे सभी क्षेत्रों में नजर आ रहा है। रोजगार सूजन नहीं हो पा रहा है। मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के बावजूद जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का शेयर जो 2013-14 में 16.7 प्रतिशत था, 2023-24 में घटकर 15.9 प्रतिशत पर आ गया। खाड़ी संकट ने भारत के आर्थिक संकट को उजागर करके रख दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने मितव्ययता की जो अपील की है वह गहरे संकट को दर्शाती है।

9 दिनों में 5 रुपए तक पेट्रोल-डीजल के दाम किस्तों में बढ़ाए गए, लगता है आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा। तेल कंपनियों के घाटे की आड़ में दाम बढ़ाए जा रहे हैं। सारा ट्रान्सपोर्ट डीजल से चलने वाले ट्रकों से होता है। परिवहन महंगा होने से सारी चीजों के दाम बढ़ना तय है। इसके लिए अमेरिका-ईरान बुध्द और होमुंज की खाड़ी की नाकाबंदी को वजह बताया जा रहा है, लेकिन जब क्रूड के दाम गिरकर 40 डालर प्रति बैरल के आसपास आ गए थे तब विभिन्न कर और उपकर लगाकर पेट्रोल-डीजल महंगा बेचा गया।

तब तेल कंपनियों को भरपूर मुनाफा कमाने की छूट दी गई थी। पीटरसन इंस्टीट्यूट के अभिषेक आनंद, अरविंद सुब्रमण्यम व जोश फेलमैन द्वारा किए गए ताजा अध्ययन में कहा गया कि 2012 से 2026 के बीच भारत में जीडीपी विकास दर 2 प्रतिशत ज्यादा बताई गई। यह दर वास्तव में 4 से 4.5 फीसदी के बीच थी। लेकिन इसे 6 प्रतिशत बताया गया। रुपए के ओवर वैल्यू की वजह से निर्यात प्रतिस्पर्धा में भारत पीछे रह गया। जीडीपी में निर्माण क्षेत्र का योगदान 2013-14 में 16.7 प्रतिशत था, जो 2023-24 में घटकर 15.9 प्रतिशत पर आ गया।

विफलताओं के लिए पिछली सरकारों को दोष देना आसान होता है। परंतु बाद में आने वाली सरकारों के हाथ में आर्थिक नीतियों को सुधारने का अधिकार होता है। क्या कमजोर वर्गों की मदद के नाम पर मुफ्तखोरी की योजनाएं लागू कर आर्थिक स्थिति नहीं बिगाड़ी गई? चुनाव सामने देखकर रेवड़ी बांटी जाती रही, जिसमें कोई पार्टी पीछे नहीं थी।

बेरोजगारों को नौकरी देने तथा प्रशिक्षण देकर कुशल बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की बजाय इस तरह के कदम उठाए गए, जो सरकारी खजाने पर बोझ साबित हुए, दीर्घावधि कर्ज देकर बैंकों की तिजोरी खाली की जाती रही। डिजिटल पेमेंट की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन इससे भी बैंकों पर बोझ बढ़ा। जनता से मितव्ययता के लिए कहा जा रहा है।

प्रशासन में भी इसे लागू किया जाए, जहां प्राथमिकता है वहीं खर्च किया जाए। वर्तमान स्थिति में नीतियों में सुधार के अलावा वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा दिया जाए, जब भारत ने 2008 की वैश्विक मंदी में भी अपने कदम मजबूत रखे तो इस समय भी वह सूझबूझ से स्थिति का मुकाबला कर सकता है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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