नवभारत विशेष: क्रीमी लेयर, तकनीकी अस्पष्टता से संकट; आरक्षण को लेकर पेचीदा स्थिति

Supreme Court Karnataka Case: सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने OBC क्रीमी लेयर पर चिंता जताते हुए पूछा कि यदि माता-पिता दोनों IAS हों तो बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिले?
Navbharat Special: The 'Creamy Layer' — A Crisis Stemming from Technical Ambiguity; A Complex Situation Regarding Reservation
क्रीमी लेयर, ओबीसी आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Supreme Court Reservation Policy: सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सरकारी नौकरी में क्रीमी लेयर के कैंडीडेट के आरक्षण लेने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अगर माता-पिता दोनों।आईएएस हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? यह मामला कर्नाटक में 'कुरबा समुदाय से, जुड़े एक कैंडीडेट का है, जहां यह समुदाय पिछड़े वर्षों की सूची में श्रेणी द्वितीय (ए) के तहत रखा गया है। उम्मीदवार यानी याचिकाकर्ता का कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड में सहायक इंजीनियर के पद पर चयन हुआ था, यह नियुक्ति आरक्षित कोटे के तहत की गई थी।

उम्मीदवार के परिवार की सालाना आमदनी 19.48 लाख रुपए आंकी गई है। जबकि फिलहाल ओबीसी क्रीमी लेयर की सालाना आय 8 लाख रुपए तय की गई है। इस तरह याचिकाकर्ता क्रीमी लेयर के दायरे में आता है और उसे आरक्षण नहीं मिल सकता। 16 नवंबर 1992 को इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह निर्णय लिया गया था कि पिछड़े वर्गों यानी ओबीसी के भीतर जो लोग आर्थिक सामाजिक रूप से आगे निकल चुके हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए ताकि यह लाभ वास्तव में जरूरतमंद वर्गों तक पहुंचे।

क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट में बहस, आरक्षण के दायरे पर सवाल

इसलिए जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा, 'यह एक ऐसा मामला है, जिस पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा, नहीं तो फिर आरक्षण देने का फायदा ही क्या है? माता-पिता ने पढ़ाई की है, वे अच्छी नौकरियों में हैं, उन्हें अच्छी आमदनी हो रही है और अब बच्चे फिर से आरक्षण मांग रहे हैं। याचिकाकर्ता के वकील शशांक रत्नू ने तर्क दिया कि सरकारी कर्मचारियों के बीच 'क्रीमी लेयर' की पहचान करने के लिए वेतन से होने वाली आय ही एकमात्र निर्णायक मापदंड नहीं होना चाहिए, अगर वेतन से होने वाली आय को ही एकमात्र मानदंड मान लिया जाएगा तो ड्राइवर, चपरासी, क्लर्क और निचले दर्जे के सरकारी कर्मचारियों को भी आरक्षण के लाभों से वंचित किया जा सकता है। अगर क्रीमी लेयर की परिभाषा समय-समय पर अदालतों द्वारा उनके निर्णायों के आधार पर देखा जाए तो वे ये है कि यह लेयर ओबीसी का वह वर्ग है, जो आर्थिक व सामाजिक रूप से मजबूत है। इसलिए क्रीमी लेयर में आने वाले परिवारों के बच्चों को ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। इसका उद्देश्य सिर्फ ये है कि आरक्षण का फायदा वास्तव में ओबीसी वर्ग के ही जरूरतमंद लोगों तक पहुंच सके।

ओबीसी क्रीमी लेयर विवाद: हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक उलझा मामला

सुप्रीम कोर्ट में आने से पहले ही यह मामला कनार्टक हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के पास था। जबकि उसके पहले हाईकोर्ट के सिंगल जज ने उम्मीदवार के पक्ष में फैसला दिया था। पक्ष में फैसला देने के पक्ष में संबंधित न्यायाधीश का तर्क यह था कि क्रीमी लेयर तय करते समय उम्मीदवार के माता-पिता की सैलरी को आय में नहीं जोड़ा जाना चाहिए, साथ ही जाति वैधता प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया था। लेकिन बाद में डिवीजन बेंच ने इस फैसले को पलट दिया।

डिवीजन बेंच का मानना था कि केंद्र सरकार का 8 सितंबर 1993 वाला आदेश जिसमें सैलरी आय को क्रीमी लेयर से बाहर रखने की बात कही गई है, वह सिर्फ केंद्र सरकार की नौकरियों और आरक्षण पर लागू होता है। भारत में ओबीसी आरक्षण को लेकर दशकों से स्थिति बेहद पेचीदा बनी हुई है। अदालतों के अलग-अलग फैसले ही तकनीकी रूप से बात को स्पष्ट करने की बजाय थोड़े और जटिल बना देते हैं।

शायद ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि इसमें संविधान, जाति व्यवस्था, सामाजिक न्याय, राजनीति, जनसंख्या और क्षेत्रीय असमानता जैसे बहुत सारे मामले और बहुत सारे तर्क एक-दूसरे में गड्डमड्ड हो जाते हैं। इन सबको एक साथ लेकर चलना बेहद तनावभरा है। सुप्रीम कोर्ट सरकारों और आयोगों के मामले भी कई बार एक-दूसरे को काटते हुए लगते हैं।

आरक्षण को लेकर पेचीदा स्थिति

भारत में ओबीसी कोई एक समान वर्ग नहीं है, इसमें अत्यंत गरीब जातियां भी हैं और कुछ ऐसी जातियां भी है, जो स्थानीय स्तर पर काफी मजबूत हो चुकी है। सवाल उठता है क्या आरक्षण पूरे समुदाय को मिले या जरूरतमंद लोगों तक ही इसकी पहुंच हो? संविधान में दो अलग-अलग विचार एक साथ चलते हैं, संविधान समानता भी चाहता है और यह भी चाहता है कि ऐतिहासिक अन्याय का सुधार हो।

लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा

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