Mahatama Gandhi Birth Anniversary Special: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में महात्मा गांधी और राष्ट्र निर्माण में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले नेताओं का जिक्र आते ही एक गंभीर, कड़े संघर्ष और राष्ट्रभक्ति से भरा माहौल आंखों के सामने आ जाता है। लेकिन इन सबके बीच बापू के जीवन के कुछ ऐसे अनसुने और हल्के-फुल्के पहलू भी हैं, जो यह बताते हैं कि विकट राजनैतिक तनावों और अंग्रेजों के खिलाफ लंबी लड़ाई के बीच भी वे और उनके साथी किस तरह जिंदादिल थे।
ऐसा ही एक बेहद दिलचस्प और मजेदार किस्सा जुड़ा है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और 'भारत कोकिला' (Nightingale of India) के नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू की दोस्ती से। बहुत कम लोग जानते हैं कि सरोजिनी नायडू प्यार और मजाक में महात्मा गांधी को 'मिकी माउस' कहकर चिढ़ाती थीं।
महात्मा गांधी और सरोजिनी नायडू के बीच का रिश्ता सिर्फ एक राजनीतिक सहयोग तक सीमित नहीं था, बल्कि दोनों के बीच एक बेहद गहरी, दोस्ताना और अनौपचारिक ट्यूनिंग थी। सरोजिनी नायडू अपने बेबाक, निर्भीक और विनोदी स्वभाव के लिए जानी जाती थीं।
ऐतिहासिक संस्मरणों और साहित्यों के अनुसार, सरोजिनी नायडू जब भी महात्मा गांधी से मिलती थीं या उन्हें पत्र लिखती थीं, तो वे बड़े ही मजाकिया अंदाज में उन्हें 'मिकी माउस' या 'माय बिलव्ड लिटिल मैन' जैसे नामों से संबोधित करती थीं।
इसके पीछे का कारण बापू का शारीरिक रूप नहीं, बल्कि सरोजिनी नायडू का हास्य-विनोद था। दरअसल, उस दौर के कार्टून कैरेक्टर 'मिकी माउस' की तरह गांधीजी के बड़े और चौड़े कान और उनकी सादगी भरा चेहरा देखकर सरोजिनी नायडू अक्सर उन्हें प्यार से इस नाम से बुलाती थीं।
दिलचस्प बात यह थी कि जब सरोजिनी नायडू उन्हें इस नाम से चिढ़ाती थीं, तो महात्मा गांधी कभी बुरा नहीं मानते थे, बल्कि ठहाके लगाकर हंसते थे। एक बार तो इस पर प्रतिक्रिया देते हुए बापू ने हंसते हुए यह तक कह दिया था कि मेरे कान तो उससे भी बड़े हैं।
यह रिश्ता दोनों तरफ से बेहद खूबसूरत था। जहां सरोजिनी नायडू बापू को 'मिकी माउस' कहकर छेड़ती थीं, वहीं महात्मा गांधी भी उनकी साहित्यिक प्रतिभा और सुरीली आवाज से इतने प्रभावित थे कि वे उन्हें प्यार से बुलबुल, 'बुलबुल-ए-हिंद' या 'वंडरिं सिंगर्स' कहकर पुकारते थे। गांधीजी अक्सर उन्हें लिखे अपने पत्रों में खुद को 'लिटिल मैन' कहकर साइन करते थे।
इन दोनों दिग्गजों की पहली मुलाकात लंदन में हुई थी, जब गोपालकृष्ण गोखले के कहने पर गांधीजी से मिलने सरोजिनी नायडू उनके घर पहुंची थीं। वहां गांधीजी की सादगी और अजीबोगरीब रहन-सहन को देखकर सरोजिनी जोर-जोर से हंस पड़ी थीं। उस पहली मुलाकात से शुरू हुई यह दोस्ती करीब तीन दशकों तक देश की आजादी की लड़ाई के हर मोर्चे पर अटूट बनी रही। दांडी मार्च से लेकर जेल यात्राओं तक, दोनों ने हर कदम पर एक-दूसरे का साथ निभाया।
महात्मा गांधी और सरोजिनी नायडू का यह अनोखा रिश्ता यह सिखाता है कि देश को आजादी दिलाने जैसे महाअभियान के दौरान भी मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए हास्य और आपसी सौहार्द कितना जरूरी था। कठिन से कठिन राजनीतिक हालातों और अंग्रेजों के दमन चक्र के बीच भी सरोजिनी नायडू की हाजिरजवाबी और उनका 'मिकी माउस' वाला संबोधन कांग्रेस के शिविरों और बैठकों में तनाव को पलभर में छू मंतर कर देता था।
गांधी जयंती के इस पावन अवसर पर यह किस्सा हमें यह याद दिलाता है कि इतिहास के महान नायक केवल किताबों के पन्नों में गंभीर और सख्त चेहरे वाले नहीं थे, बल्कि वे भी आम इंसानों की तरह प्यार, हंसी-मजाक और जिंदादिली से भरपूर जीवन जीते थे।