EAC PM Report On Declining Fertility Rate In India: केंद्र सरकार मिशन-2047 को पूरा करने में लगी है, लेकिन उसे नई परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने देश में घटती प्रजनन दर पर गंभीर चिंता जताई है। उसने सरकार को चेतावनी दी है कि भारत अगर अपनी जनसंख्या नियंत्रण की पुरानी नीति से बाहर नहीं निकलता है, तो देश में उम्रदराज लोगों की नई समस्या पैदा होगी। अब हमें नसबंदी जैसे कार्यक्रम या तो बंद कर देने चाहिए या फिर उनको अपनाने के लिए जो सुविधा और इंसेंटिव दिए जा रहे हैं, उन्हें तत्काल बंद कर देना चाहिए।
इस तरह की रिपोर्ट ने यह चिंता उत्पन्न की है कि क्या हम भी चीन या जापान की राह पर पहुंच रहे हैं? मुख्य समस्या है, देश में वर्ष 2050 तक बुजुर्गों की संख्या का बढ़ना। माना जा रहा है कि वर्ष 2036 तक यह आबादी 23 करोड़ हो जाएगी और 2050 तक इसके 34 करोड़ होने की उम्मीद है। अभी भारत में यह संख्या तकरीबन 16 करोड़ को पार कर चुकी है। इसका मतलब यह हुआ कि उस समय भारत में हर 5 व्यक्तियों पर एक बुजुर्ग होगा?
भारत में विश्व बैंक, स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट अथॉरिटी तथा संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अरबों डालर कर्ज के बाद 70 के दशक में नसबंदी की नीति लागू हुई। संजय गांधी ने इसे इस तरह से लागू कराया कि तब इसे एक बुरे सपने की तरह लिया जाता था। सरकारी कर्मचारियों को नसबंदी का लक्ष्य दिया जाता था।
अनुमानित संख्या के आधार पर उस दौरान एक करोड़ लोगों की नसबंदी की गई। जबरन नसबंदी के केस हर कहीं सुनने को मिलते थे। बाद में नसबंदी के लिए महिला-पुरुष दोनों को ही प्रोत्साहन राशि मिलने लगी। अब भारत की आबादी को बढ़ाने या स्थिर रखने के लिए नसबंदी को एक तरह से बंद करने की बात की जा रही है। जब प्रजनन दर सामाजिक तथा मानसिक स्तर पर तय सीमा से नीचे गिर जाती है, तो इसे वापस लाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
वर्तमान में यूपी तथा बिहार को छोड़कर देश की प्रजनन दर 1.6 है। दिल्ली, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, केरल, तमिलनाडु इसमें आगे हैं। यहां पर यह दर काफी नीचे है। वर्ष 2001 में जो बच्चे हर साल 2.93 करोड़ पैदा हो रहे थे, वह 2023 में घटकर 2.32 करोड़ रह गए। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, तो बीमारियां भी तेजी से बढ़ती हैं और कार्यक्षमता कम हो जाती है। अभी भारत में डायबिटीज, मानसिक बीमारी अल्जाइमर, ब्लड प्रेशर तथा घुटनों की समस्याएं दूसरे देशों से अधिक हैं।
प्रजनन की उम्र पहले जो औसतन 22 वर्ष थी, वह अब 27-28 वर्ष हो चुकी है। सरकार को पेंशन योजनाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, मानसिक सुरक्षा पर अधिक खर्च करना होगा। युवाओं के कार्यबल कम होने से उत्पादन भी घटेगा। बच्चों की आबादी 1991 में 36.3 प्रतिशत थी, वह 2023 में 24.2 ही बची है। मतलब बच्चे कम पैदा हो रहे हैं। भारत जनसंख्या के स्थिरीकरण मानक 2.1 से काफी नीचे है।
वर्तमान में देश की आबादी का 9.7 प्रतिशत भाग सेवानिवृत्त लोगों का है। प्रधानमंत्री ने यह कहा है कि विकसित भारत 2047 के संकल्प को पूरा करने में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है, तो यह बात समझी जा सकती है कि बच्चे कम पैदा हो रहे हैं। देश में सर्वाधिक शिक्षा वाले राज्य केरल में आबादी का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा रिटायर यानी 60 साल के लोगों का है और यहीं पर 80 साल से अधिक की उम्र के लोग 11 प्रतिशत के आसपास हैं।
बच्चों के पैदा होने की दर 1.3 है, तो विकसित राष्ट्र में युवाओं की भागीदारी का क्या होगा? तमिलनाडु इस सबसे अलग काम कर रहा है। वहां पर तीसरा बच्चा यदि जन्मता है, तो मां को अवकाश तो एक साल तक का मिल जाएगा पर इस वित्त वर्ष में 1.6 लाख महिलाओं की नसबंदी की भी योजना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना है कि जब हम आजादी के 100 साल का जश्न मना रहे होंगे, तो दुनिया में हम विकसित राष्ट्र भी बन चुके होंगे। इसके लिए कई तरह की योजनाएं चरणबद्ध तरीके से चल रही हैं। पर वर्तमान में युवा वर्ग अब शादी वाली दुनिया में जाने के प्रति कम रुचि दिखा रहा है। इसका कारण क्या हैं? विकसित भारत कैसे बन पाएगा, यह संदेश ईएसी-पीएम की रिपोर्ट में मिलता है।
लेख- मनोज वार्ष्णेय के द्वारा