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नवभारत विशेष: नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रंप की बेचैनी क्यों? जानें पूरा मामला

Trump Nobel Peace Prize: नोबेल शांति पुरस्कार 2026 नहीं मिलने पर डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्वे और पुरस्कार निर्णायकों की आलोचना की। जानिए क्यों ट्रंप खुद को इस सम्मान का हकदार मानते हैं।

अंकिता पटेल

Highlights

  • नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलने पर डोनाल्ड ट्रंप की नाराजगी, नॉर्वे और निर्णायकों पर साधा निशाना।

  • ट्रंप ने पुरस्कार न दिए जाने को नॉर्वे के लिए कभी न मिटने वाला कलंक बताया।

  • ट्रंप ने नोबेल शांति पुरस्कार के विजेता नवी पिल्लै की पहचान पर भी टिप्पणी की।

  • ट्रंप पहले भी कई बार खुद को नोबेल शांति पुरस्कार का हकदार बता चुके हैं।

Trump Reaction to Nobel Peace Prize: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को आखिर नोबेल शांति पुरस्कार पाने की इतनी बेचैनी क्यों है? क्या दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश का राष्ट्रपति होना उनके लिए पर्याप्त नहीं है। 9 अक्टूबर को नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा के बाद ट्रंप ने नॉर्वे और पुरस्कार के निर्णायकों पर आक्रामक अंदाज में निशाना साधा। उन्हें पुरस्कार न दिए जाने को ट्रंप ने नॉर्वे के माथे पर ऐसा कलंक बताया है, जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकेगा।

ट्रंप ने पुरस्कार विजेता भारतवंशी नवी पिल्लै को ऐसी शख्सियत बताया, जिसके बारे में किसी ने सुना तक नहीं। फरवरी 2025 में इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ व्हाइट हाउस में बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा था, 'नोबेल शांति पुरस्कार मुझे कभी नहीं मिलेगा, हालांकि मैं इसका सबसे वाजिब हकदार हूं। जून 2025 में उनका दावा एक बार फिर मुखर हो गया। उन्होंने कहा कि अब तक उन्हें 4 या 5 बार यह पुरस्कार मिल जाना चाहिए था।

नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रंप की दावेदारी

कुछ ही समय बाद उन्होंने यह भी कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध और इजराइल-ईरान संघर्ष सहित किसी भी मामले में कुछ भी कर लें, पुरस्कार उन्हें नहीं मिलेगा, क्योंकि निर्णायक उदारवादी विचारधारा के लोगों को ही चुनते हैं। इस क्रम में उनकी दलीलें कई रूपों में सामने आईं कहीं युद्ध रोकने का दावा, कहीं परमाणु संघर्ष टालने का श्रेय, कहीं मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने की उपलब्धि, तो कहीं यह शिकायत कि राजनीतिक विचारधारा के कारण उनके साथ अन्याय हो रहा है।

अमेरिकी प्रतिनिधि क्लॉडिया टेनी ने जनवरी 2026 में तीसरी बार उनके नाम का समर्थन करते हुए नामांकन किया। पाकिस्तान सरकार ने जून 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान कथित निर्णायक कूटनीतिक हस्तक्षेप के लिए उन्हें 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार हेतु नामित करने की घोषणा की। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी उनके नाम की पैरवी की। इस तरह ट्रंप की निजी आकांक्षा को पाकिस्तान सहित कुछ विदेशी सरकारों और राजनीतिज्ञों का सार्वजनिक समर्थन भी मिला। लेकिन नामांकन किसी पुरस्कार की गारंटी नहीं होता।

ट्रंप के 8 युद्ध रुकवाने के दावे पर सवाल

किसी व्यक्ति का नाम प्रस्तावित होना और स्वतंत्र निर्णायक समिति द्वारा उसे पुरस्कार के योग्य मानना दो अलग बातें हैं। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रंप की सबसे प्रमुख दलील यह है कि उन्होंने दुनिया में 8 युद्ध रुकवाए, इसलिए उन्हें 8 नोबेल शांति पुरस्कार मिलने चाहिए थे।

अक्टूबर 2026 में उन्होंने जिन संघर्षों का फिर से उल्लेख किया है, उनमें भारत-पाकिस्तान, इजराइल-ईरान, इजराइल हमास, कंबोडिया-थाईलैंड, सर्बिया कोसोवो, रवांडा-कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, आर्मेनिया-अजरबैजान तथा मिस्त्र-इथियोपिया के विवाद शामिल थे।

उन्होंने उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया, जापान-उत्तर कोरिया और चीन ताइवान के बीच भी संभावित संघर्ष टालने का श्रेय लिया है। रूस-यूक्रेन और ईरान के मामलों को भी उन्होंने अपनी भावी शांति उपलब्धियों के रूप में पेश किया। स्वतंत्र तथ्य जांच संस्था फैक्टचेक डॉट ओआरजी ने अगस्त 2025 में स्पष्ट किया था कि ट्रंप के बताए सभी संघर्ष न तो वास्तविक युद्ध थे, न ही सभी का समाधान हो चुका था।

भारत ने विशेष रूप से इस दावे का खंडन किया कि भारत-पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई रोकने के मामले में अमेरिकी मध्यस्थता निर्णायक थी। हमारे विदेश मंत्रालय के मुताबिक सैन्य कार्रवाई रोकने की सहमति दोनों देशों के बीच सीधे स्थापित संपर्क माध्यमों से बनी थी। दूसरी ओर पाकिस्तान ने ट्रंप की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उनके नामांकन की घोषणा की थी। इसी तरह 2020 के अब्राहम समझौते ट्रंप की विदेश नीति की वास्तविक कूटनीतिक उपलब्धियों में गिने जा सकते हैं।

खुद को सबसे वाजिब हकदार बताया

डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार क्यों नहीं मिला, इस पर बहस हो सकती है। उनकी वास्तविक कूटनीतिक उपलब्धियों का निष्पक्ष मूल्यांकन भी होना चाहिए, लेकिन पुरस्कार न मिलने पर किसी देश को कलंकित करना, विजेता का अपमान करना और अपनी नाराजगी को दबाव की भाषा में व्यक्त करना, उस शांति की भावना से मेल नहीं खाता, जिसके लिए यह सम्मान दिया जाता है।

लेख-लोकमित्र गौतम के द्वारा

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