ईरान पर हमले से क्यों पीछे हटे ट्रंप? वो 6 वजहें जिसने महाशक्ति को झुकने पर किया मजबूर, जानें इनसाइड स्टोरी

Middle East Crisis: मध्य पूर्व में भीषण तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के ऊर्जा ढांचे पर सैन्य हमले को 5 दिनों के लिए टाल दिया है। ट्रंप ने इसे "सकारात्मक बातचीत" का नतीजा बताया है।
Why Did Trump Back Down from Attacking Iran? The 6 Reasons That Forced the Superpower to Yield—Discover the Inside Story.
राष्ट्रपति ट्रंप और मुजतबा खामेनेई
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US-Iran Conflict: मिडिल ईस्ट में जारी भीषण संघर्ष के बीच आज दुनिया ने कुछ राहत महसूस की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर जानकारी दी कि उन्होंने ईरान के बिजली संयंत्रों और ऊर्जा ढांचे पर प्रस्तावित सैन्य हमलों को 5 दिनों के लिए टालने का आदेश दिया है।

ट्रंप के अनुसार, पिछले दो दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच “काफी सकारात्मक” बातचीत हुई है, जिसका मकसद क्षेत्र में तनाव को पूरी तरह खत्म करना है। वहीं दूसरी ओर, ईरान का दावा है कि उसकी चेतावनियों के कारण अमेरिका पीछे हटने पर मजबूर हुआ है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किन कारणों से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने रुख में यह अचानक बदलाव किया है।

ट्रंप ने क्यों मारा यू-टर्न?

डोनाल्ड ट्रंप ने करीब 36 घंटे पहले ईरान के खिलाफ कड़े सैन्य एक्शन की बात कही थी, लेकिन अब वे बातचीत की ओर झुकते नजर आ रहे हैं। उनके इस बदलाव के पीछे कई अहम वजहें बताई जा रही हैं-

1. अमेरिकी सेना के लिए फंड की कमी

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने लगभग 19 लाख करोड़ रुपये के बजट की मांग की है, जबकि रोजाना करीब 13 हजार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि संसद में ट्रंप की अपनी पार्टी के भीतर ही इस बजट का विरोध हो रहा है, जिससे इसके पास होने पर सवाल खड़े हो गए हैं।

2. ईरान के हमलों से बढ़ा दबाव

ईरान ने शनिवार रात इजराइल के डिमोना और अरद जैसे परमाणु केंद्रों पर मिसाइल हमले किए। इससे इजराइल के साथ-साथ अमेरिका भी दबाव में आ गया और रणनीति पर पुनर्विचार की जरूरत महसूस हुई।

3. नाटो का समर्थन नहीं मिलना

32 देशों के सैन्य गठबंधन नाटो ने अमेरिका के बार-बार अनुरोध के बावजूद अपनी सेना भेजने से इनकार कर दिया। ब्रिटेन ने होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए युद्धपोत भेजने की बात कही, लेकिन उन्हें सीधे युद्ध क्षेत्र में तैनात नहीं किया। जर्मनी, इटली और तुर्किये जैसे देश भी सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहे, जिससे अमेरिका अलग-थलग पड़ता दिखा।

4. ताइवान में चिप उत्पादन पर संकट

अमेरिका ताइवान से सेमीकंडक्टर चिप्स का सबसे बड़ा आयातक है। ताइवान अपनी 97% ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। टीएसएमसी के पास सिर्फ 11 दिन की हीलियम सप्लाई बची है, जिससे चिप उत्पादन रुकने की कगार पर है। कतर से सप्लाई बंद होने का असर एप्पल और एनवीडिया जैसी कंपनियों पर भी पड़ने लगा था।

5. खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे को नुकसान

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल के मुताबिक, खाड़ी के सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे 9 देशों के करीब 40% ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचा है। वैश्विक तेल आपूर्ति में रोजाना 11 मिलियन बैरल की कमी आ चुकी है, जो 2022 के बाद सबसे बड़ा संकट बनकर उभर रही है। इससे खाद की कमी जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

6. मिडटर्म चुनाव का दबाव

नवंबर में अमेरिका में मिडटर्म चुनाव होने वाले हैं, जो ट्रंप के लिए बड़ी परीक्षा माने जा रहे हैं। टैरिफ नीतियों और ईरान तनाव के चलते महंगाई बढ़ रही है, जबकि उनकी अप्रूवल रेटिंग में भी 12% की गिरावट आई है। ऐसे में उन्हें सीनेट में बहुमत बनाए रखना बेहद जरूरी हो गया है, ताकि महाभियोग जैसी स्थिति से बचा जा सके।

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