पिंपरी-चिंचवड़ महानगरपालिका (सोर्स: सोशल मीडिया) 
पुणे

PCMC Financial Crisis: पिंपरी-चिंचवड़ मनपा पर 4493 करोड़ का कर्ज, विकास कार्यों पर मंडराया संकट

PCMC Financial Crisis: कभी देश की सबसे अमीर नगर पालिकाओं में गिनी जाने वाली पिंपरी-चिंचवड़ मनपा अब भारी आर्थिक संकट से जूझ रही है। 4493 करोड़ की देनदारी ने विकास कार्यों की रफ्तार पर बड़ा असर डाला है।

अपूर्वा नायक

PCMC Financial Crisis News: पिंपरी-चिंचवड़ महानगर पालिका, जिसे कभी देश की सबसे धनी नगर पालिकाओं में गिना जाता था, आज गहरे आर्थिक संकट के भंवर में फंस गई है। शहर की वित्तीय स्थिति इतनी चिंताजनक हो गई है कि अब विकास कार्यों के पहिये थमने की कगार पर हैं।

हाल ही में सामने आई लेखा विभाग की रिपोर्ट ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि तत्कालीन आयुक्त के कार्यकाल के दौरान अपनाई गई 'खर्च होने दो' की नीति ने मनपा की तिजोरी खाली कर दी है। वर्तमान में मनपा पर लगभग 4 हजार 493 करोड़ रुपये की देनदारी का भारी बोझ आ गया है, जिसने शहर के विकास पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

मनमाने ढंग से कामकाज चलाया गया

इस आर्थिक बदहाली की जड़ें पिछले कुछ वर्षों के प्रशासनिक राज में छिपी हैं। साल 2022 से 2026 के बीच, जब महानगर पालिका में जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त हो चुका था, तब सत्ता की बागडोर पूरी तरह से तत्कालीन आयुक्त शेखर सिंह के हाथों में थी। उनके पास जनरल बॉडी और स्थायी समिति जैसे महत्वपूर्ण निकायों के अधिकार सुरक्षित थे।

आरोप है कि इस दौरान लेखा एवं वित्त विभाग द्वारा दी गई चेतावनियों और सुझावों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। वित्त विभाग ने बार-बार खर्चों में कटौती करने और राजस्व के नए स्रोत खोजने की सलाह दी थी, लेकिन प्रशासन ने अनियंत्रित खर्च जारी रखा।

इसी प्रशासनिक मनमानी का नतीजा है कि आज जब नवनिर्वाचित प्रतिनिधि सदन में लौटे हैं, तो उन्हें फंड की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। अधिकारी अब बजट की कमी का हवाला देकर नए विकास कार्यों को मंजूरी देने से हाथ पीछे खींच रहे हैं।

अनिवार्य खर्चों में हुई बेतहाशा वृद्धि

मनपा की आर्थिक रीढ़ टूटने का एक बड़ा कारण अनिवार्य खर्चों में हुई बेतहाशा वृद्धि है। लेखा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, भू-अधिग्रहण, पीएमपीएमएल बस सेवा का घाटा, स्मार्ट सिटी परियोजनाओं का रखरखाव, धन्वंतरी स्वास्थ्य योजना और बिजली-पानी के बिल जैसे मदों पर सालाना लगभग 1 हजार 563 करोड़ 63 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके विपरीत, आय के स्रोतों को विकसित करने में प्रशासन पूरी तरह विफल रहा है। पिछले कई वर्षों से संपत्ति कर और जल कर की दरों में कोई ठोस संशोधन नहीं किया गया, जिससे राजस्व स्थिर रह गया जबकि महंगाई और खर्च बढ़ते चले गए।

प्रशासन की मनमानी से खजाना खाली

वित्त विभाग ने सुझाव दिया था कि नई संपत्तियों का सर्वेक्षण कर उन्हें टैक्स के दायरे में लाया जाए और विज्ञापन होर्डिंग्स, फ्लेक्स एवं कियोस्क के शुल्कों में वृद्धि की जाए, लेकिन इन सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

सफेद हाथी साबित हो रहा ट्रांसपोर्ट

परिवहन सेवा भी मनपा के लिए सफेद हाथी साबित हो रही है। पीएमपीएमएल बस सेवा के परिचालन घाटे की भरपाई के लिए मनपा को हर महीने करीब 20 करोड़ 45 लाख रुपये देने पड़ रहे हैं। वार्षिक बजट में केवल परिवहन और वेतन आयोग के अंतर के लिए ही 417 करोड़ रुपये का प्रावधान करना पड़ता है। इसके अलावा, स्मार्ट सिटी के नाम पर बनाई गई परियोजनाओं के रखरखाव पर भी सालाना 50 करोड रुपये स्वाहा हो रहे है।

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