Girish Mahajan-Uday Samant (सोर्सः एआय जनरेटेड फोटो-सोशल मीडिया) 
नासिक

समर्थन मिला, फिर भी नरेंद्र दराडे की राह आसान नहीं; विधान परिषद चुनाव में सस्पेंस बरकरार

Nashik Politics: नासिक स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र की विधान परिषद चुनाव में शिवसेना उम्मीदवार नरेंद्र दराडे को समर्थन मिलने के बावजूद चुनाव निर्विरोध नहीं हो सका है।

आंचल लोखंडे

Nashik MLC Election: नासिक स्थानीय प्राधिकरण निर्वाचन क्षेत्र की विधान परिषद चुनाव में समर्थन की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है। लेकिन शिवसेना के उम्मीदवार नरेंद्र दराडे की बेचैनी बढ़ने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में जोर पकड़ रही है। चुनाव को निर्विरोध कराने के लिए मंत्री गिरीश महाजन और उदय सामंत ने नासिक में ही डेरा डालकर जोरदार प्रयास किए। उन्हें आंशिक सफलता भी मिली, लेकिन नामांकन वापसी की अवधि समाप्त होने के बाद भी चुनाव निर्विरोध नहीं हो सका। ऐसे में अब दराडे को सीधे मतदान की कसौटी पर उतरना पड़ेगा।

महाजन-सामंत ने नासिक में जमाया डेरा

प्रसाद हिरे ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर दराडे को समर्थन दे दिया है, जबकि गोकुल गिते भी समर्थन की घोषणा करेंगे, ऐसा दावा गिरीश महाजन ने किया है। इस समर्थन को सुनिश्चित करने के लिए महाजन और सामंत ने लगातार कई बैठकें कीं। नामांकन वापसी की समयसीमा समाप्त होने के बाद भी उनका नासिक में डेरा बने रहना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि महायुति ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है।

मतपत्र पर बने रहेंगे नाम

हालांकि समर्थन की घोषणा हो चुकी है, लेकिन प्रसाद हिरे और गोकुल गिते के नाम मतपत्र पर बने रहेंगे। इससे चुनाव के निर्विरोध होने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो गई है। मतदान होना तय है, इसलिए दराडे को प्रत्येक मत के लिए अलग से मेहनत करनी पड़ेगी। ऐसे में समर्थन मिलने के बावजूद जीत पूरी तरह सुनिश्चित नहीं मानी जा रही है।

नगरसेवकों का बढ़ा महत्व

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि चुनाव निर्विरोध हो जाता तो स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका सीमित रह जाती। लेकिन अब मतदान तय होने से नगरसेवकों और सदस्यों का महत्व अचानक बढ़ गया है। प्रत्येक मतदाता तक पहुंचना, उनकी नाराजगी दूर करना और मतदान के दिन उन्हें मतदान केंद्र तक लाना उम्मीदवारों के सामने बड़ी चुनौती बन गया है।

मतों के बंटवारे का भी डर

समर्थन देने वाले उम्मीदवारों के नाम मतपत्र पर बने रहने से मतों के बंटवारे की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। स्थानीय गुटबाजी या कुछ मतदाताओं की नाराजगी के कारण आधिकारिक समर्थन के बावजूद अलग मतदान हो सकता है। ऐसे में कागजों पर मिला समर्थन वास्तव में मतपेटी तक कितना पहुंचता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि समर्थन देने वाले उम्मीदवारों को भी कुछ मत मिल जाते हैं तो अंतिम परिणाम में अप्रत्याशित तस्वीर सामने आ सकती है।

सौदेबाजी की चर्चाओं को मिला बल

मतदान तय होने से नगरसेवकों की अपेक्षाएं और दबाव बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। चुनाव में प्रत्येक मत महत्वपूर्ण होने के कारण उम्मीदवारों को बड़े पैमाने पर जनप्रतिनिधियों की नाराजगी दूर करनी पड़ेगी। इसी वजह से स्थानीय स्तर पर सौदेबाजी की चर्चाओं को भी हवा मिल रही है। समर्थन की घोषणाएं हो चुकी हैं, लेकिन असली लड़ाई अब शुरू हुई है, ऐसी चर्चा राजनीतिक हलकों में चल रही है।

समर्थन मिला, लेकिन चिंता बरकरार

महाजन और सामंत के प्रयासों से समर्थन का चित्र काफी हद तक साफ हो गया है, लेकिन अंतिम परिणाम आने तक कोई जोखिम नहीं लेने की रणनीति महायुति के नेताओं में दिखाई दे रही है। यही कारण है कि समर्थन मिलने के बावजूद नरेंद्र दराडे की चिंता कम होती नहीं दिख रही। मतदान के दिन तक राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।

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