Single Registration Counter At Nagpur Super Specialty Hospital: नागपुर शहर में भले ही बीते कुछ सालों में शासकीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लंबे-चौड़े दावे किए जा रहे हों, लेकिन धरातल पर मरीजों की दुश्वारियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। महंगे निजी अस्पतालों के दौर में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सहारा बना शासकीय सुपरस्पेशलिटी अस्पताल खुद ही प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हो चुका है। आलम यह है कि अस्पताल के ओपीडी काउंटर से लेकर डॉक्टर के केबिन तक हर दिन अफरा-तफरी और बदहाली का माहौल देखने को मिल रहा है।
सुपरस्पेशलिटी अस्पताल में फिलहाल लगभग 9 प्रमुख चिकित्सा विभाग कार्यरत हैं। हर दिन अलग-अलग विभागों की ओपीडी मिलाकर औसतन 700 से अधिक मरीज पहुंचते हैं। यानी महज एक हफ्ते में 4,000 से ज्यादा गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीज यहां इलाज कराने आते हैं। इतनी भारी तादाद के बावजूद अस्पताल में मरीजों के पंजीयन (Registration) के लिए सालों पुरानी ढर्रे की व्यवस्था ही जारी है। पर्याप्त काउंटर न होने के कारण सुबह से ही मरीजों और उनके परिजनों की लंबी-लंबी कतारें लग जाती हैं।
पंजीयन कक्ष पुराना और छोटा होने की वजह से कतार में खड़े मरीजों को पर्ची बनवाने के लिए आधे से एक घंटे तक भीषण तकलीफ झेलनी पड़ती है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अस्पताल प्रशासन ने वरिष्ठ नागरिकों, अति-गंभीर मरीजों या गर्भवती महिलाओं के लिए कोई अलग काउंटर या विशेष प्राथमिकता की व्यवस्था नहीं की है। एक ही कतार में खड़े होकर दर्द से कराह रहे बुजुर्ग भी अपनी बारी का इंतजार करने को मजबूर हैं।
किसी तरह पंजीयन पर्ची मिलने के बाद भी मरीजों की मुसीबतें खत्म नहीं होतीं। संबंधित विभाग की ओपीडी के बाहर फिर से लंबी कतारें इंतजार कर रही होती हैं। यद्यपि एक ओपीडी में 5 से 6 डॉक्टर तैनात रहते हैं, लेकिन मरीजों की भारी संख्या के आगे उनकी रफ्तार भी धीमी पड़ जाती है। दोपहर 1 बजे तक अगर किसी का नंबर नहीं आया, तो उसे अगली ओपीडी के दिन तक का इंतजार करना पड़ता है। नागपुर के अलावा गड़चिरोली, चंद्रपुर, भंडारा और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिलों से आने वाले गरीब मरीजों के लिए बार-बार चक्कर लगाना आर्थिक और शारीरिक रूप से बेहद कष्टदायक साबित हो रहा है।