Nagpur Station Traffic Chaos: नागपुर रेलवे स्टेशन के पूर्वी या पश्चिमी छोर एंट्री-एग्जिट की हालत अब नर्क से भी बदतर नजर आने लगी है। अतिक्रमण, फुटपाथ पर कब्जे, बेतरतीब वाहन, ऑटो चालकों की मनमानी और हर समय रेंगता ट्रैफिक यात्रियों के लिए मुसीबत बन चुका है।
स्टेशन पर टेकड़ी रोड की बात करें या बजरिया की और स्टेशन रोड की। हालत बद से बदतर हो चुकी है। हाथ में बैग, कंधे पर सामान और साथ में महिलाओं, बच्चे-बुजुर्ग लेकर निकलने वाले यात्रियों को वाहनों के बीच से रास्ता बनाना पड़ता है।
फुटपाथ का इस्तेमाल पैदल चलने के बजाय ठेले लगाने और दुकानें चलाने के लिए किया जा रहा है। दोनों सड़कें अतिक्रमण और बेतरतीब पार्किंग के कारण सिकुड़ गई हैं। यात्री सड़क पर चले तो वाहन का खतरा और किनारे चलें तो अतिक्रमण की बाधा, आखिर जाएं तो जाएं कहां?
स्टेशन पर देश के बड़े शहरों मुंबई, दिल्ली, पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु जैसे मेट्रो शहरों से रोजाना यात्री आते-जाते हैं, ट्रेन से उतरकर जब वे बाहर निकलते हैं और उन्हें अतिक्रमण से घिरीं सड़कें, बेतरतीब वाहन, जाम और ऑटो चालकों की मनमानी दिखाई देती है तो नागपुर शहर की पहली छवि उनके मन में कैसी बनती होगी, यह समझना मुश्किल नहीं है।
एक तरफ शहर को आधुनिक, विकसित और मेट्रो शहरों की कतार में खड़ा करने के दावे किए जाते हैं, दूसरी तरफ शहर के सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार पर यात्रियों को अव्यवस्था से जूझना पड़ता है। नागपुर की पहचान का पहला परिचय यदि जाम और अतिक्रमण से हो तो करोड़ों की परियोजनाओं की चमक कितनी देर टिकेगी?
सवाल सीधा है, अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी किसकी है? ऑटो की मनमानी रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? सड़क पर ट्रैफिक व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी किसकी है? मनपा, यातायात पुलिस, आरटीओ और अन्य संबंधित एजेंसियां यदि अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं तो फिर स्टेशन के दोनों बाहरी हिस्सों में यह बदहाली क्यों दिखाई दे रही है?
कई ट्रैफिक डीसीपी आए और गए लेकिन स्टेशन के सामने ट्रैफिक व्यवस्था नहीं सुधर सकी। वहीं दबी जुबान में आरोप लगते रहे हैं कि रेलवे प्रशासन ट्रैफिक पुलिस के सुझावों को तवज्जो नहीं देता। इन आरोपों के बीच जरूरी है कि सभी संबंधित एजेंसियां आपसी समन्वय से स्टेशन तक पहुंचने और वहां से बाहर निकलने का रास्ता हमेशा व्यवस्थित रखें।
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