मारबत (सोर्स: सोशल मीडिया)
नागपुर

इडा, पीडा घेऊन जा गे मारबत... नागपुर में 145 साल से ऐसे शहर की बुराई को विदा करता आ रहा है ये अनोखा जुलूस

Nagpur Marbat Utsav: पोला के अगले दिन नागपुर में निकलती काली-पीली मारबत और बड़ग्या की 145 साल पुरानी परंपरा, जहां जुलूस के जरिए बुराई, बीमारी और सामाजिक पीड़ा को शहर से दूर ले जाने की मान्यता है।

वेदांत जोशी

Kali Pili Marbat Badgya Nagpur Culture: एक पल के लिए सोचिए...सुबह का नागपुर, आम दिनों की तुलना में गलियों में आज कुछ ज्यादा ही चहल-पहल है। कहीं ढोल की आवाज सुनाई दे रही है, कहीं नारे गूंज रहे हैं और सड़क के दोनों तरफ लोग जमा हैं। हर किसी को इंतजार है उस पल का, जब शहर की पुरानी और अनोखी परंपरा एक बार फिर सड़कों पर उतरने वाली है।

कुछ देर बाद भीड़ के बीच एक विशाल आकृति दिखाई देती है, मारबत। उसके पीछे बड़ग्याओं की कतार और साथ चलता लोगों का हुजूम। जैसे-जैसे जुलूस आगे बढ़ता है, सड़कों पर भीड़ बढ़ती जाती है और पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता है।

नागपुर में बैल पोला के दूसरे दिन निकलने वाला यह जुलूस किसी साधारण धार्मिक शोभायात्रा जैसा नहीं है। यह शहर की ऐसी लोकपरंपरा है, जिसमें इतिहास, आस्था, सामाजिक व्यंग्य और जनभावना एक साथ दिखाई देती है। सरकारी पर्यटन पोर्टल के अनुसार मारबत उत्सव की जड़ें 19वीं सदी के औपनिवेशिक दौर तक जाती हैं और इसका मुख्य आयोजन पोला के दूसरे दिन होता है।

पुरानी मारबत की तस्वीर

काली और पीली मारबत... दो रंग, कई कहानियां

मारबत उत्सव की पहचान मुख्य रूप से काली मारबत और पीली मारबत से होती है। काली मारबत की परंपरा को 1881 से जोड़ा जाता है। इसके पीछे नागपुर के भोसले राजघराने की बकाबाई और अंग्रेजों से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रम की लोकस्मृति बताई जाती है।

वहीं पीली मारबत की शुरुआत 1885 के आसपास मानी जाती है और इसे उस दौर की बीमारियों तथा ब्रिटिश सत्ता के विरोध से जोड़कर देखा जाता है। यानी ये सिर्फ पुतले नहीं थे।ये उस दौर के लोगों की आवाज थे। जब लोगों के पास अपनी नाराजगी या डर को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने के सीमित माध्यम थे, तब मारबत का जुलूस एक ऐसा मंच बन गया, जहां समाज अपनी परेशानियों को प्रतीक के रूप में सड़क पर ला सकता था।

पीली मारबत

बीमारी से लेकर बुराई तक... सबको ले जाओ मारबत

समय के साथ मारबत का अर्थ और व्यापक होता गया। लोगों की आस्था बनी कि मारबत को शहर से बाहर ले जाकर दहन करने से बीमारियां, संकट, नकारात्मकता और सामाजिक बुराइयां भी शहर से बाहर चली जाएंगी। इसी भावना को जुलूस में गूंजने वाला पारंपरिक नारा और मजबूत करता है, “इडा, पीडा घेऊन जा गे मारबत।” अर्थात शहर की पीड़ा और बुराइयों को अपने साथ लेकर जाओ मारबत।

मारबत के साथ निकलने वाले बड़ग्या इस परंपरा को एक और दिलचस्प रंग देते हैं। ये छोटे प्रतीकात्मक पुतले होते हैं, जिनमें समय-समय पर समाज की अलग-अलग समस्याओं और लोगों की नाराजगी को जगह मिलती रही है। महंगाई, भ्रष्टाचार, नशा और दूसरी सामाजिक परेशानियां बड़ग्या के जरिए व्यंग्य और प्रतीक के रूप में सामने आती रही हैं।

काली मारबत

बच्चों के कचरे से शुरू हुआ बड़ग्या का खेल

बड़ग्या की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। बताया जाता है कि बच्चों ने कागज, पेड़ की टहनियों और घर में पड़े बेकार सामान से छोटे-छोटे पुतले बनाकर उन्हें जुलूस में शामिल करना शुरू किया। धीरे-धीरे यही प्रयोग बड़ा हुआ और बड़ग्या समाज की नाराजगी व्यक्त करने का एक माध्यम बन गया। इसलिए मारबत का जुलूस सिर्फ देखने की चीज नहीं है। यह नागपुर के लोगों के मन की बात सड़क पर उतरने का एक लोकमंच भी है।

डोम्या बड़ग्या

पीढ़ियां बदल गईं, मारबत बनाने वाले हाथ नहीं

इस परंपरा की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि मारबत सिर्फ हर साल निकलती नहीं, बल्कि हर साल फिर से बनाई जाती है। बांस, कागज, कपड़े और अन्य सामग्री से विशाल पुतलों को आकार देने वाले कारीगरों की पीढ़ियां इस काम से जुड़ी रही हैं। कई परिवारों के लिए मारबत बनाना सिर्फ हुनर नहीं, बल्कि विरासत है। इसी वजह से करीब डेढ़ सौ साल बाद भी काली और पीली मारबत की पहचान नागपुर से अलग नहीं हुई है।

काली मारबत, पीली मारबत

अब मारबत को मिल रही है नई पहचान

2026 में इस ऐतिहासिक परंपरा को और बड़े स्तर पर पहचान दिलाने की कोशिश हो रही है। नागपुर महानगरपालिका ने पहली बार बड़े पैमाने पर आयोजन को संस्थागत समर्थन दिया है और करीब 2 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। 11 सितंबर को होने वाले मुख्य जुलूस को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने की तैयारी की गई है। 

इस साल परंपरा में एक नया रंग भी जुड़ा है। इमामबाड़ा क्षेत्र में करीब 13 फुट ऊंची सिल्वर मारबत तैयार की गई है, जिसका संदेश शांति, एकता और सद्भाव बताया गया है। हालांकि काली और पीली मारबत आज भी इस परंपरा के केंद्र में हैं।

आखिर क्यों खास है नागपुर की मारबत?

क्योंकि देश में त्योहार बहुत हैं, जुलूस भी बहुत हैं, लेकिन नागपुर की मारबत अपने आप में अलग है। यहां एक पुतला सिर्फ पुतला नहीं रहता। वह कभी बीमारी का प्रतीक बनता है, कभी सत्ता के विरोध की आवाज, कभी सामाजिक बुराई का चेहरा और कभी आम आदमी के गुस्से का माध्यम। फिर उसे शहर की गलियों से गुजारा जाता है। हजारों लोग उसके पीछे चलते हैं, ढोल बजते हैं, नारे गूंजते हैं, और आखिर में जब मारबत को शहर की सीमा से बाहर ले जाया जाता है, तो मानो पूरा शहर एक साथ यही कह रहा होता है की जो बुरा है, जो दुख देता है, जो समाज को पीछे खींचता है... उसे यहीं छोड़ दो ("इडा, पीडा घेऊन जा गे मारबत...")

नागपुर की मारबत सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि शहर की सामूहिक चेतना और भावनाओं की पहचान है। हर साल बुराई के प्रतीक पुतलों के साथ लोग अपनी पीड़ा और उम्मीदों को भी विदा करते हैं। यही वजह है कि 145 साल बाद भी मारबत नागपुर की गलियों में इतिहास नहीं, बल्कि हर साल नया संदेश बनकर लौटती है।

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