किसानों के साथी बैलों के प्रति कृतज्ञता का अनोखा त्योहार! महाराष्ट्र में धूमधाम से मनाया जाता है बैल पोला

Bail Pola Celebration: महाराष्ट्र और विदर्भ में किसानों और मवेशियों के अटूट संबंध का उत्सव बैल पोला धूमधाम से मनाया जाता है। जानिए इसके पौराणिक महत्व, पारंपरिक रस्मों और व्यंजनों के बारे में।
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पोला त्योहार की सांकेतिक फोटो(सोर्स: एआई फोटो)
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Bail Pola Festival Maharashtra: महाराष्ट्र और मध्य भारत की कृषि संस्कृति में त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये मनुष्य, प्रकृति और मवेशियों के अटूट संबंध का उत्सव मनाते हैं। ऐसा ही एक अनूठा और मनमोहक त्योहार है बैल पोला, जो हर साल श्रावण मास की अमावस्या को पूरे महाराष्ट्र, विशेषकर विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

यह दिन उन मवेशियों के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर है, जो पूरे वर्ष खेतों में पसीना बहाकर किसानों के जीवन का आधार बनते हैं। पोला के दिन बैलों को खेतों के काम से पूरी तरह विश्राम दिया जाता है और उन्हें परिवार के सम्मानित सदस्य की तरह पूजा जाता है।

पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक जड़ें

इस त्योहार का संबंध पौराणिक मान्यताओं और प्राचीन इतिहास दोनों से गहराई से जुड़ा है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण बाल रूप में थे, तब कंस ने उनका वध करने के लिए 'पोलासुर' नामक एक असुर को सांड़ के वेश में भेजा था। बाल कृष्ण ने उस दैत्य को पहचानकर उसका वध कर दिया था। यही कारण है कि यह दिन मवेशियों के सम्मान के साथ-साथ बच्चों के प्रति स्नेह प्रकट करने के लिए भी समर्पित है। इसके अलावा, इसे भगवान शिव के वाहन नंदी के प्रति भक्ति और आदर से भी जोड़कर देखा जाता है।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, वैदिक काल से ही पशुधन को समृद्धि का प्रतीक माना गया है। यादव वंश के शासनकाल में मवेशियों के पूजन से जुड़ी सामुदायिक रस्मों का विस्तार हुआ और मराठा साम्राज्य में छत्रपति शिवाजी महाराज के समय यह उत्सव ग्रामीण संस्कृति का प्रमुख हिस्सा बन गया।

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विशेष रस्में और सतरंगी साज-सज्जा

पोला की तैयारियां एक दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। त्योहार की पूर्व संध्या पर 'वेसन तोड़ी' (नाक की रस्सी ढीली करना) और 'खांदशेखणी' (घी या घरेलू सफेद मक्खन से बैलों के कंधों की मालिश) की शांत एवं आत्मीय रस्म निभाई जाती है।

मुख्य दिन के तड़के किसानों द्वारा बैलों को नदियों या जलाशयों में ले जाकर अच्छी तरह नहलाया जाता है। इसके बाद उनका आकर्षक शृंगार किया जाता है सींगों को रंगा जाता है, गले में नए घुंघरू व कौड़ियों की माला बांधी जाती है, और पीठ पर रेशमी व कढ़ी हुई खूबसूरत कपड़ा डाली जाती है। दोपहर बाद गांव में ढोल-ताशा और लेझिम के संगीतमय वातावरण में सजधज कर निकले बैलों का भव्य जुलूस निकाला जाता है। घर लौटने पर महिलाएं द्वार पर रंगोली सजाती हैं, घी का दीपक जलाकर बैलों की आरती उतारती हैं, सींगों पर हल्दी-कुमकुम लगाती हैं और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं।

स्वादिष्ट पारंपरिक व्यंजन, पहले बैलों का भोग

पोला की एक खास और खूबसूरत व्यवस्था यह है कि परिवार के भोजन करने से पहले बैलों को स्वादिष्ट पकवान परोसे जाते हैं। इस दिन हर घर में चने की दाल और गुड़ के मिश्रण से बनी प्रसिद्ध मीठी रोटी पूरनपोली बनाई जाती है। इसके अलावा करंजी, बाजरे की भाकरी, कढ़ी, वड़ा-भात और मसालेदार सब्जियों के व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं।

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बच्चों का तान्हा पोला और इको-फ्रेंडली पहल

पोला के अगले दिन नागपुर जिले और विदर्भ में बच्चों के लिए 'तान्हा पोला' का आयोजन किया जाता है। इस अनूठी परंपरा की शुरुआत वर्ष 1789 में नागपुर के राजा श्रीमंत राजे रघुजी महाराज भोंसले (द्वितीय) ने की थी, ताकि बच्चों में मवेशियों के प्रति प्रेम और कृषि का महत्व जागे। बच्चे लकड़ी या मिट्टी के बने छोटे बैलों को सजाकर जुलूस निकालते हैं और घर-घर जाकर उपहार तथा मिठाइियाँ पाते हैं।

समय के साथ इस त्योहार में पर्यावरण और पशु-स्वास्थ्य सुरक्षा के सजग प्रयास भी शामिल हुए हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले के कानडवाड़ी गांव में एनिमल राहत संस्था के सहयोग से किसानों ने बैलों के सींग छीलने और उन पर रासायनिक पेंट लगाने की हानिकारक प्रथा को पूरी तरह बंद कर दिया, क्योंकि इनसे बैलों में सींग के कैंसर और त्वचा की एलर्जी का खतरा रहता था। अब किसान हल्दी के प्राकृतिक लेप और रंग-बिरंगे रिबन से अपने बैलों को पूरी तरह सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से सजाते हैं।

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