महादेव लैंड डेवलपर, (सोर्स: सोशल मीडिया)  
नागपुर

Nagpur Investment Fraud: महादेव लैंड डेवलपर केस में HC का आदेश, 6 दिसंबर के निर्देश पर मांगी प्रोग्रेस रिपोर्ट

Nagpur Mahadev Land Developer: महादेव लैंड डेवलपर मामले में HC ने ऑफिशियल लिक्विडेटर व 5 जिलों के कलेक्टरों से मांगा जवाब। अदालत ने निवेशकों के बकाया व संपत्तियों की बिक्री पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की।

अंकिता पटेल

Nagpur Investors Case High Court: नागपुर महादेव लैंड डेवलपर की ओर से योजना घोषित की गई जिसके अनुसार निश्चित राशि जमा करने पर हर महीने प्रोत्साहन राशि का भुगतान भी कंपनी की ओर से किया जाना था किंतु इस संदर्भ में दिए गए विज्ञापन के अनुसार प्रोत्साहन राशि का भुगतान नहीं किया।

इसके बाद संजय निंबूलकर एवं अन्य 47 निवेशकों की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई, हाई कोर्ट ने अब इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए ऑफिशियल लिक्विडेटर और 5 जिलों के कलेक्टरों से जवाब तलब किया है।

अदालत ने निवेशकों और लेनदारों के बकाया के निपटारे तथा संपत्तियों की बिक्री के संबंध में उठाए गए कदमों की विस्तृत जानकारी मांगी है। सुनवाई के दौरान, लेनदारों (क्रेडिटर्स) का पक्ष रख रहीं अधि। राधिका बजाज और अन्य वकीलों ने अदालत के समक्ष बताया कि ऑफिशियल लिक्विडेटर ने 6 दिसंबर 2024 और उसके बाद दिए गए आदेशों के अनुपालन में अब तक उठाए गए कदमों से अदालत को अवगत नहीं कराया है।

अब तक क्या कदम उठाए ?

संपत्तियों की स्थिति और उनके मालिकाना हक को स्पष्ट करने के लिए हाई कोर्ट ने सहायक सरकारी वकील को निर्देश दिया है कि वे नागपुर, जलगांव, वर्धा, अमरावती और बुलढाना जिलों के कलेक्टरों की ओर से हलफनामा दायर करें। अदालत ने इन सभी कलेक्टरों से जवाब मांगा है कि उन्होंने संबंधित प्लॉटों के सीमांकन और उन्हें ऑफिशियल लिक्विडेटर के नाम पर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में क्या कदम उठाए हैं।

आयकर विभाग का 320 करोड़ का दावा खारिज

गत समय हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया जिससे कंपनी के सैकड़ों गरीब लेनदारों और निवेशकों को उनका अटका हुआ पैसा वापस मिलने की बड़ी उम्मीद जगी है। न्या. अनिल पानसरे की अदालत ने 18 जुलाई 2025 को दिए अपने आदेश में आयकर विभाग के 320 करोड़ रुपये के प्राथमिकता वाले दावे को खारिज करने के आधिकारिक लिक्विडेटर के फैसले को बरकरार रखा था।

अदालत ने 4 अप्रैल 2014 को कंपनी के वाइडिंग अप (परिसमाधन) का आदेश पारित किया था। इस प्रक्रिया के दौरान, आयकर विभाग ने कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 530 के तहत अपनी कर देनदारी के भुगतान में प्राथमिकता की मांग करते हुए आवेदन किया था।

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