-जयश्री दाणी
Rishi Pathak Navbharat Interview: यह देश वक्ताओं, अपने विचार खुलकर व्यक्त करने वालों का है, इसलिए किसी का अंधानुयायी बनने के बजाय खुद अपनी बात रखने वाले वक्ता बनें। यह विचार गीतकार और संगीतकार ऋषि पाठक ने नागपुर प्रवास के दौरान 'नवभारत' के साथ एक विशेष बातचीत में व्यक्त किए।
फिल्म 'हनुमान अंश' के संगीत को मिली अपार सफलता के बाद सुर्खियों में आए ऋषि पाठक ने बताया कि सिनेमा के पर्दे पर दृश्य कहानी बयां करते हैं लेकिन संगीत और शब्द ही उसके भावविश्व को गहराई देते हैं। इस फिल्म के गीतों में कथा, भक्ति और संवेदना का अनूठा त्रिवेणी संगम देखने को मिलता है।
लाइन प्रोड्यूसर की भी निभाई भूमिका ऋषि पाठक ने बताया कि उन्होंने इस फिल्म में केवल संगीतकार ही नहीं बल्कि शुरुआत से लाइन प्रोड्यूसर के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। फिल्म के 3 मुख्य गीतों में उनका सीधा योगदान रहा है।
वैष्णव जन: प्रसिद्ध भजन को अपनी अनूठी शैली में संगीतबद्ध कर स्वरबद्ध किया।
राम भजन की ओर: इस गीत का लेखन और संगीत संयोजन किया। अपनी सफलता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि सच्ची लगन और समर्पण के साथ काम करते हुए जो भी सफलता मिली उसे मैंने पूर्ण समर्पण भाव से ईश्वर के चरणों में अर्पित कर दिया है।
इसी शक्ति ने मुझे सफलता-असफलता के भेद से परे निर्मोही बना दिया है। कठिन परिस्थितियों पर निष्ठा और भक्ति से पाई विजय: निर्माता विशाल
गीतों के निर्माण पर चर्चा करते हुए ऋषि पाठक ने कहा कि गीतों के शब्द बेहद सरल, निष्कलंक लेकिन दिल को छू लेने वाले हैं जिससे दर्शक खुद को इनसे जोड़ पाते हैं। संगीत में पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ-साथ मॉडर्न, क्लासिकल गिटार और मेंडोलिन जैसे तार वाद्ययंत्रों का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है।
इस संगीतमय सफर में धीरेंद्र मुल्कलवार, शांतनु सुदामे, अभिजीत सत्पथी, ईशान शर्मा और निवेदिता पद्मनाभन का भी सराहनीय सहयोग रहा। ऋषि ने बताया कि साधु तिवारी द्वारा लिखित 'पार्वती' गाना उनका व्यक्तिगत रूप से सबसे पसंदीदा गीत है।
ऋषि पाठक ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि बाहरी दुनिया को एक्सप्लोर करने से पहले युवाओं को अपनी समृद्ध संस्कृति और जड़ों को जानना चाहिए। जीवन की सभी समस्याओं का समाधान हमारी संस्कृति में ही छिपा है और अंततः हमें यही वापस लौटना है।
'हनुमान अंश' फिल्म से यह उद्देश्य पूरा हुआ है और लोगों में एक नई सांस्कृतिक जागृति आई है। लोग अब 'हेलो' की जगह 'सीताराम' कहने लगे हैं। इस बड़े बदलाव या 'रामसेतु' के निर्माण में हमारा योगदान एक छोटी सी गिलहरी जैसा है।