Nagpur Football Talent Development: शाम होते ही उपराजधानी के कई मैदानों पर एक ही दृश्य दिखाई देता है। हाथों में फुटबॉल लिए बच्चे, पसीना बहाते युवा खिलाड़ी और किनारे खड़े सपनों को देखते माता-पिता। नागपुर-कामठी में फुटबॉल कोई नया खेल नहीं है। इसकी अपनी परंपरा है, क्लब संस्कृति है, खिलाड़ी हैं और जुनून भी है।
लेकिन जब सवाल पूछा जाता है कि इन मैदानों से निकलकर देश की सर्वोच्च फुटबॉल व्यवस्था तक कितने खिलाड़ी पहुंचे ? तो तस्वीर अचानक बदल जाती है। यही वह सवाल है, जिसने नागपुर फुटबॉल की इस पड़ताल को जन्म दिया।
नवभारत की पड़ताल में सामने आया कि शहर में करीब 80 से ज्यादा क्लब पंजीकृत हैं। हजारों खिलाड़ी अलग-अलग स्तर पर प्रशिक्षण लेते हैं। जिला स्तर पर नागपुर की टीम पिछले कई वर्षों से मजबूत प्रदर्शन करती रही है।
इंटर डिस्ट्रक्ट प्रतियोगिताओं में नागपुर शीर्ष टीमों में शामिल रहा है। इसके बावजूद राष्ट्रीय टीम, आईएसएल और बड़े प्रोफेशनल क्लबों तक पहुंचने वाले खिलाड़ियों की संख्या बेहद सीमित है। इस रास्ते में सबसे बड़ी बाधा निकलकर सामने आई वह वह प्रतिभा की नहीं, बल्कि उस रास्ते की है जो एक सामान्य खिलाड़ी को मैदान से राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाता है।
भारतीय फुटबॉल में पंजाब की मिनर्वा फुटबॉल अकादमी एक उदाहरण के रूप में सामने आती है। इस अकादमी ने केवल टूर्नामेंट जीतने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि खिलाड़ी तैयार करने की पूरी प्रक्रिया बनाई, कम उम्र में प्रतिभा पहचानना, रेसिडेंशियल प्रशिक्षण, पढ़ाई के साथ खेल, फिटनेस, पोषण, वीडियो एनालिसिस और लगातार राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर - यह पूरा मॉडल खिलाड़ी को लंबे सफर के लिए तैयार करता है।
यही सबसे बड़ा अंतर नागपुर और ऐसे सफल मॉडलों के बीच दिखाई देता है। नागपुर में भी कई निजी अकादमियां अपने स्तर पर अच्छा काम कर रही हैं, लेकिन शहर स्तर पर ऐसा कोई साझा सिस्टम अभी भी दिखाई नहीं देता जहां 10-12 साल की उम्र से खिलाड़ी की पहचान कर उसे अगले 8-10 वर्षों की योजना के साथ तैयार किया जाए।
नवभारत ने सिटी की फुटबॉल संरचना, इसकी कमियां, खूबियां, मैदान की स्थिति, ग्राउंड रिपोर्ट सहित निराकरण को लेकर विशेषज्ञों की राय ली। यह एक्सपर्ट पैनल अपने समय में भारतीय फुटबॉल के मुख्य चेहरे रहे है।
फुटबॉल विशेषज्ञों के अनुसार किसी शहर की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि वहां कितने टूनमिट होते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि वहां से कितने खिलाड़ी ऊपरी स्तर पर जाते हैं। नागपुर में प्रतियोगिताओं की कमी नहीं है। स्कूल टूर्नामेंट, जिला प्रतियोगिताएं, क्लब मुकाबले होते हैं, लेकिन सवाल यह है कि प्रतियोगिता के बाद खिलाड़ी का अगला कदम क्या है? क्या उसके प्रदर्शन का डेटा तैयार होता है? क्या उसकी कमजोरियों पर अलग से काम किया जाता है? क्या उसे बेहतर क्लबों और राष्ट्रीय स्तर के ट्रायल तक पहुंचाने की कोई व्यवस्था है? यहीं सबसे बड़ा अंतर सामने आता है।
पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों का मानना है कि नागपुर में क्षमता कमी नहीं है। यहां से कई खिलाड़ी राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे हैं, लेकिन लगातार खिलाड़ी तैयार करने वाला सिस्टम विकसित नहीं हो पाया। पूर्व खिलाड़ियों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि फुटबॉल खेल के लिए शहर में अनुभव मौजूद है, लेकिन उसका उपयोग खिलाड़ी विकास की योजना बनाने में कितना हो रहा है, यह सबसे बड़ा सवाल है।
-नवभारत लाइव के लिए नागपुर से जयदीप रघुवंशी की रिपोर्ट