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आरटीआई से मुंबई के सरकारी अस्पतालों में जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी के आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया।
पिछले तीन वर्षों में सायन अस्पताल में 35 जेंडर सर्जरी दर्ज की गईं।
जेजे और नायर अस्पताल में केवल एक-एक सर्जरी हुई, जबकि केईएम में एक भी ऑपरेशन नहीं हुआ।
Mumbai Government Hospitals: सरकारी अस्पतालों में जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी की सुविधा और मरीजों के आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, मुंबई के सायन अस्पताल यानी लोकमान्य टिलक म्युनिसिपल जनरल हॉस्पिटल में पिछले तीन साल में 35 सर्जरी हुईं।
वहीं, जेजे और नायर अस्पताल में सिर्फ एक-एक सर्जरी हुई है। इसके अलावा, केईएम अस्पताल में एक भी सर्जरी का खाता नहीं खुला है। यह जानकारी आरटीआई कार्यकर्ता चेतन कोठारी द्वारा मांगी गई थी।
विभाग ने बताया कि पिछले तीन साल में 535 टॉप और बॉटम सर्जरी की गई। इसके अलावा, जनरल सर्जरी विभाग ने मार्च 2023 से अब तक 14 सर्जरी की जानकारी दी है। इन मरीजों की आगे की न देखभाल प्लास्टिक सर्जरी विभाग संभालता है। अस्पताल का कहना है कि ई सर्जरी की सफलता या असफलता तय करने के लिए फिलहाल कोई निश्चित पैमाना तय नहीं किया गया है।
जेजे अस्पताल में वर्ष 2023-24 के दौरान केवल एक जेंडर सर्जरी हुई, जिसकी सफलता दर 100 प्रतिशत दर्ज की गई, हालांकि, इसके बाद के दो वित्तीय वर्षों में एक भी सर्जरी नहीं की गई। इसी तरह, नायर अस्पताल में भी केवल एक सर्जरी दर्ज की गई और उसकी सफलता दर भी 100 प्रतिशत बताई गई है। इन आंकड़ों से साफ है कि इन बड़े अस्पतालों में यह सुविधा अभी शुरुआती चरण में है।
सायन अस्पताल में सर्जरी से पहले दो योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से जांच कराना अनिवार्य है। साथ ही, मरीजों को काउंसलिंग और मेडिकल प्रमाणपत्र लेना भी जरूरी होता है। सायन और नायर अस्पतालों में इस सर्जरी की फीस 5,000 रुपए है, जबकि केईएम में बड़ी सर्जरी के लिए 2,000 रुपए लिए जाते हैं। हालांकि, इलाज के दौरान दवाओं और अन्य मेडिकल सामग्री का खर्च पूरी तरह अलग होता है। निजी अस्पतालों में 3 लाख से 5 लाख रुपए में यही सर्जरी की जाती है। प्राइवेट अस्पतालों की तुलना में सरकारी अस्पलातों का खर्च बेहद कम है।
लिंग परिवर्तन से जुड़े मामलों में भी विभिन्न अस्पतालों के आंकड़े काफी अलग हैं। नायर अस्पताल में हर साल लगभग 8 से 9 इंटरसेक्स मरीज इलाज के लिए दर्ज किए जाते हैं। इसके विपरीत, सायन अस्पताल में ऐसे किसी भी मरीज के इलाज का आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। वहीं, जेजे अस्पताल में भी पिछले तीन साल के दौरान ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है।