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सुप्रीम कोर्ट के जज उज्जल भुइंया के बयान ने छेड़ी सामाजिक बहस
‘जिस समाज में लोग सवाल पूछने से डरते हैं, वहां तानाशाही पनपने का खतरा बढ़ जाता है’
मेघालय में यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस & टेक्नोलॉजी के दीक्षांत समारोह में कहा
Supreme Court Judge Statement: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के एक बयान ने इन दिनों फिर एक सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। मेघालय स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि जिस समाज में लोग सवाल पूछने से डरते हैं, वहां तानाशाही पनपने का खतरा बढ़ जाता है। उनका यह बयान सिर्फ एक अकादमिक विचार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने का आह्वान है।
जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट किया कि मनमानी सत्ता अज्ञानता, भय और बिना जांचे-परखे विश्वासों पर फलती-फूलती है। जो समाज बिना सबूत के दावों को स्वीकार कर लेता है, वह अंधविश्वास और गलत सूचनाओं का शिकार आसानी से हो जाता है। इसी तरह, जो समाज अपनी परंपराओं को सवालों और समीक्षा से परे मान लेता है, वह अन्यायपूर्ण प्रथाओं में सुधार करने में नाकाम रहता है। सवाल पूछना और तर्क करना लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। जब नागरिक सवाल पूछने से कतराते हैं, तो सत्ता पर अंकुश कमजोर पड़ जाता है और निरंकुशता की जड़ें मजबूत होने लगती हैं।
जस्टिस ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51ए(एच) का जिक्र करते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा की भावना विकसित करने पर जोर दिया। वैज्ञानिक सोच सिर्फ प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह रोजमर्रा की जिंदगी में तार्किक सोच, पूछताछ और सुधार की आदत पैदा करती है। विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों को छात्रों में यही स्वभाव विकसित करना चाहिए, ताकि वे सतही बातों से आगे जाकर गहराई से सोच सकें और स्वतंत्र निर्णय ले सकें। जस्टिस भुइयां ने एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने समाज को ‘हम’ और ‘वे’ की विभाजनकारी सोच छोड़ने की सलाह दी।
संविधान की प्रस्तावना ‘हम, भारत के लोग’ से शुरू होती है। यह ‘हम’ की भावना ही विविधता में एकता बनाए रखती है। यह एकरूपता नहीं थोपती, बल्कि अलग-अलग पहचानों को सम्मान देते हुए साझा संवैधानिक एकता को मजबूत करती है। आज के समय में जब समाज में भावनात्मक बयानबाजी और बिना जांच के दावे तेजी से फैल रहे हैं, जस्टिस भुइयां का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खुली बहस, असहमति का सम्मान और सवाल पूछने की आजादी जरूरी है। सवाल पूछना विद्रोह नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता की निशानी है।