गौतम अडानी समूह की परियोजनाओं और राजनीतिक संबंधों को लेकर अक्सर तीखे सवाल उठते हैं।
सरकारी परियोजनाओं के आवंटन में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ती है।
किसी भी कारोबारी को मिलने वाले ठेकों पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते रहते हैं।
Relationship Between Indian Industrialists And Ruling Governments: देश में सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं बदलती हैं और चुनाव के साथ सत्ता का चेहरा भी बदल जाता है। लेकिन बड़े उद्योगपतियों और सरकारों के बीच कारोबारी संबंध हमेशा चर्चा में रहते हैं। आजादी के बाद कभी टाटा और बिरला जैसे औद्योगिक घराने इस बहस के केंद्र में रहे, तो आज मुकेश अंबानी और गौतम अडानी जैसे कारोबारी समूहों को लेकर सवाल उठते हैं।
आखिर बड़े उद्योगपति सत्ता के करीब क्यों दिखाई देते हैं? क्या वे किसी एक राजनीतिक दल के समर्थक होते हैं या उनका मकसद सरकार के साथ बेहतर कारोबारी तालमेल बनाए रखना होता है? चुनावी चंदे से लेकर सरकारी टेंडर, जमीन, लाइसेंस और निवेश तक, राजनीति और कारोबार के बीच कई स्तरों पर संबंध बनते हैं। इसे समझने के लिए भारत में कॉरपोरेट फंडिंग के इतिहास और मौजूदा उदाहरणों पर नजर डालना जरूरी है।
भारत में उद्योगपतियों और राजनीतिक दलों के संबंधों का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन के दौर तक जाता है। उद्योगपति घनश्यामदास बिरला महात्मा गांधी और कांग्रेस के प्रमुख समर्थकों में शामिल थे। आजादी के बाद भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाया, जिसमें निजी उद्योगों के साथ सरकारी क्षेत्र की भी अहम भूमिका थी।
1950 और 1960 के दशक में उद्योग लगाने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आयात करने के लिए सरकारी लाइसेंस और मंजूरियां जरूरी थीं। ऐसे में उद्योगपतियों के लिए सरकार और नीति-निर्माताओं के साथ संवाद बनाए रखना कारोबारी जरूरत बन गया।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के ऐतिहासिक विश्लेषण के मुताबिक, 1962 से 1968 के बीच टाटा और बिरला समूहों ने मिलकर कुल कॉरपोरेट राजनीतिक चंदे का लगभग 34 प्रतिशत योगदान दिया था। उस दौर में कांग्रेस के अलावा स्वतंत्र पार्टी को भी बड़े कारोबारी घरानों से चंदा मिलता था। इससे स्पष्ट है कि राजनीतिक दलों को आर्थिक सहयोग देने में उद्योगपतियों की भूमिका नई नहीं है।
राजनीति और कारोबार के संबंधों में 1969 एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इंदिरा गांधी सरकार ने कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 293A में बदलाव कर कंपनियों की ओर से राजनीतिक दलों को सीधे चंदा देने पर प्रतिबंध लगा दिया।
इससे पहले 1961 में कंपनियों को राजनीतिक चंदा देने की अनुमति दी गई थी। इसकी सीमा पिछले तीन वित्तीय वर्षों के औसत शुद्ध मुनाफे के पांच प्रतिशत तक तय थी। 1969 के प्रतिबंध के बाद कंपनियों के सीधे राजनीतिक योगदान के औपचारिक रास्ते सीमित हो गए। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि राजनीतिक चंदा पूरी तरह बंद हो गया। दूसरे माध्यमों से राजनीतिक दलों को आर्थिक सहयोग मिलता रहा।
1985 में राजीव गांधी सरकार ने कंपनी अधिनियम में संशोधन कर कॉरपोरेट चंदे पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। लेकिन कंपनियों के योगदान की सीमा पांच प्रतिशत ही रखी गई। 2013 में नए कंपनी अधिनियम की धारा 182 के तहत इसे बढ़ाकर पिछले तीन वित्तीय वर्षों के औसत शुद्ध मुनाफे का 7.5 प्रतिशत कर दिया गया।
इसके बाद 2017 के वित्त अधिनियम के जरिए यह सीमा हटा दी गई। इसी बदलाव ने आगे चलकर चुनावी बॉन्ड को लेकर भी बहस खड़ी की।
| वर्ष | सरकार / प्रधानमंत्री | प्रमुख बदलाव | राजनीतिक चंदे की सीमा |
|---|---|---|---|
| 1961 | जवाहरलाल नेहरू सरकार | कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 293A के तहत कंपनियों को राजनीतिक दलों को चंदा देने की अनुमति मिली। | पिछले 3 वर्षों के औसत शुद्ध मुनाफे का अधिकतम 5% |
| 1969 | इंदिरा गांधी सरकार | कंपनी अधिनियम में संशोधन कर कंपनियों के सीधे राजनीतिक चंदे पर प्रतिबंध लगाया गया। | प्रतिबंध |
| 1985 | राजीव गांधी सरकार | कंपनी अधिनियम में संशोधन कर कॉरपोरेट राजनीतिक चंदे पर लगा प्रतिबंध हटाया गया। | पिछले 3 वर्षों के औसत शुद्ध मुनाफे का अधिकतम 5% |
| 2013 | मनमोहन सिंह सरकार | नए कंपनी अधिनियम की धारा 182 के तहत राजनीतिक चंदे की सीमा बढ़ाई गई। | पिछले 3 वर्षों के औसत शुद्ध मुनाफे का अधिकतम 7.5% |
| 2017 | नरेंद्र मोदी सरकार | वित्त अधिनियम 2017 के जरिए कॉरपोरेट राजनीतिक चंदे की 7.5% की सीमा हटा दी गई। इसी वर्ष इलेक्टोरल बॉन्ड योजना भी लाई गई। | कोई अधिकतम सीमा नहीं |
1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की। उस समय वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे। लाइसेंस-परमिट व्यवस्था को धीरे-धीरे कम किया गया, विदेशी निवेश के रास्ते खोले गए और निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ी।
इसके बावजूद सरकार की भूमिका खत्म नहीं हुई। आज भी जमीन, बिजली, खनन, पर्यावरणीय मंजूरी, टेलीकॉम स्पेक्ट्रम, सरकारी खरीद और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं से जुड़े फैसले सरकारें लेती हैं। इसलिए बड़े कारोबारी समूहों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण रहता है।
दूसरी ओर, सरकारों को भी निजी क्षेत्र से निवेश, रोजगार, टैक्स, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में सहयोग की जरूरत होती है। यही परस्पर निर्भरता राजनीति और कारोबार के रिश्ते को मजबूत बनाती है।
राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने, प्रचार करने और संगठन चलाने के लिए धन की जरूरत होती है। कंपनियां और कारोबारी समूह भी कानूनी माध्यमों से राजनीतिक चंदा दे सकते हैं। 2013 में केंद्र सरकार ने इलेक्टोरल ट्रस्ट स्कीम को औपचारिक रूप दिया। इसके तहत कंपनियां और व्यक्ति ट्रस्ट को योगदान देते हैं और ट्रस्ट राजनीतिक दलों को धन वितरित करते हैं।
2017 में केंद्र सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना शुरू की, जिसकी बिक्री जनवरी 2018 में शुरू हुई। इस व्यवस्था में व्यक्ति और कंपनियां भारतीय स्टेट बैंक से बॉन्ड खरीदकर राजनीतिक दलों को दे सकते थे। लेकिन दानदाता की पहचान आम जनता के सामने सार्वजनिक नहीं होती थी।
15 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने राजनीतिक फंडिंग की जानकारी छिपाने को मतदाताओं के सूचना के अधिकार के खिलाफ माना। कंपनी अधिनियम में किए गए उन संशोधनों को भी असंवैधानिक ठहराया गया, जिनसे कंपनियों को असीमित राजनीतिक चंदा देने की अनुमति मिली थी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कॉरपोरेट चंदा पूरी तरह बंद हो गया। इलेक्टोरल ट्रस्ट और घोषित योगदान जैसे दूसरे कानूनी माध्यम अब भी मौजूद हैं।
ADR की 26 मार्च 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को 20 हजार रुपये से अधिक के कुल 6,648.56 करोड़ रुपये के चंदे की घोषणा की गई। इसमें कॉरपोरेट और कारोबारी क्षेत्र का योगदान 6,128.79 करोड़ रुपये यानी 92.18 प्रतिशत था।
रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा को 5,717.17 करोड़ रुपये का कॉरपोरेट चंदा मिला, जबकि अन्य सभी राष्ट्रीय दलों को मिलाकर यह रकम 411.62 करोड़ रुपये थी। भाजपा को कुल 6,074.02 करोड़ और कांग्रेस को 517.39 करोड़ रुपये का घोषित चंदा मिला।
ADR की इलेक्टोरल ट्रस्ट रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में 10 ट्रस्टों ने राजनीतिक दलों को 3,826.35 करोड़ रुपये वितरित किए। इसमें भाजपा को 3,157.65 करोड़ रुपये यानी कुल वितरण का 82.52 प्रतिशत मिला, जबकि कांग्रेस को 298.78 करोड़ रुपये मिले। ये आंकड़े राजनीतिक फंडिंग में कॉरपोरेट क्षेत्र की बड़ी भूमिका दिखाते हैं, लेकिन अपने आप में अनुचित लेन-देन का प्रमाण नहीं हैं।
मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाला रिलायंस समूह पेट्रोकेमिकल, रिफाइनिंग, टेलीकॉम, रिटेल, डिजिटल सेवाओं और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में कारोबार करता है। इनमें से कई क्षेत्र सरकारी नीतियों और नियामकीय फैसलों से प्रभावित होते हैं। 2016 में रिलायंस जियो के बाजार में आने के बाद टेलीकॉम क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और नियामकीय नियमों को लेकर व्यापक बहस हुई।
चुनावी बॉन्ड के मामले में रिलायंस से जुड़ी कंपनी Qwik Supply Chain का नाम भी सामने आया। रॉयटर्स ने मार्च 2024 में कंपनी के दस्तावेजों के आधार पर बताया कि तीन रिलायंस से जुड़ी कंपनियों की इसमें कुल 50.04 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। Qwik Supply Chain ने 2022 और 2023 में 410 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन बॉन्ड में से 375 करोड़ रुपये भाजपा, 25 करोड़ रुपये शिवसेना और 10 करोड़ रुपये राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को मिले। हालांकि, रिलायंस ने स्पष्ट किया था कि Qwik Supply Chain उसकी किसी भी इकाई की सहायक कंपनी नहीं है। इसलिए इस रकम को मुकेश अंबानी का व्यक्तिगत योगदान या रिलायंस इंडस्ट्रीज का प्रत्यक्ष चंदा कहना सही नहीं होगा।
गौतम अडानी राजनीति और परियोजनाएं
गौतम अडानी का समूह पोर्ट, एयरपोर्ट, बिजली, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में सक्रिय है। इन कारोबारों में सरकारी नीतियां, टेंडर, जमीन और बिजली खरीद समझौते महत्वपूर्ण होते हैं।
इसका उदाहरण बिहार का पीरपैंती थर्मल पावर प्रोजेक्ट है। सितंबर 2025 में अडानी पावर ने बिहार स्टेट पावर जनरेशन कंपनी के साथ 2,400 मेगावाट बिजली की आपूर्ति के लिए 25 साल का समझौता करने की घोषणा की। कंपनी के मुताबिक, प्रतिस्पर्धी बोली में उसने 6.075 रुपये प्रति किलोवाट घंटा की सबसे कम दर पेश की थी।
इस परियोजना पर कांग्रेस ने आरोप लगाया कि लगभग 1,050 एकड़ जमीन अडानी समूह को एक रुपये सालाना की टोकन लीज पर दी जा रही है। इसके जवाब में बिहार सरकार ने कहा कि जमीन का हस्तांतरण 2022 में ही बिहार स्टेट पावर जनरेशन कंपनी को किया गया था और उसका मालिकाना हक राज्य सरकार के पास है। सरकार के मुताबिक, अडानी पावर का चयन प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया से हुआ।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परियोजना के लिए पांच गांवों में 988.335 एकड़ निजी यानी रैयती जमीन का अधिग्रहण किया गया, जिससे 919 जमीन मालिक प्रभावित हुए। यहां 1,050 एकड़ की परियोजना भूमि और निजी जमीन अधिग्रहण के आंकड़ों में अंतर समझना जरूरी है। किसी कंपनी को सरकारी परियोजना मिलना अपने आप में पक्षपात का प्रमाण नहीं है। इसके लिए टेंडर और जमीन आवंटन से जुड़े दस्तावेजों की जांच जरूरी है।
इस सवाल का जवाब केवल चुनावी चंदे से नहीं मिल सकता। उद्योगपतियों को कारोबार के लिए स्थिर नीतियां, मंजूरियां और बुनियादी सुविधाएं चाहिए, जबकि सरकारों को निवेश, रोजगार और आर्थिक विकास के लिए निजी क्षेत्र की जरूरत होती है।
इसलिए किसी कंपनी का सरकार के साथ काम करना राजनीतिक समर्थन का प्रमाण नहीं है। इसी तरह किसी पार्टी को चंदा देना भी अपने आप में सरकारी फैसले के बदले लाभ मिलने का सबूत नहीं है। इसके लिए दस्तावेजी प्रमाण और स्वतंत्र जांच जरूरी है।
आखिरकार असली सवाल यह नहीं है कि उद्योगपति किस पार्टी के साथ दिखाई देते हैं, बल्कि यह है कि सरकारों के फैसले किसके हित में लिए जा रहे हैं किसी एक कारोबारी समूह के या आम जनता के? इस रिश्ते में पारदर्शिता, निष्पक्ष टेंडर और सभी कंपनियों के लिए समान अवसर ही लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था, दोनों के हित में हैं।