Ujjwala Wadekar Innovative Teaching Methods: शिक्षक सिर्फ वह नहीं होता जो बंद कमरों में चार दीवारों के बीच ब्लैक बोर्ड पर कुछ शब्द लिख दे और किताबें पढ़वा दे। सच्चा शिक्षक वह है जो बच्चे के मन में छिपे डर को मिटाकर उसमें अनंत संभावनाओं का दीया जला दे। शिक्षक दिवस के इस खास मौके पर हम आपको रूबरू करा रहे हैं महाराष्ट्र के जलगांव जिले की एक ऐसी ही कर्मयोगी शिक्षिका से, जिन्होंने पिछले 31 सालों में न सिर्फ ग्रामीण शिक्षा की परिभाषा बदली, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि अगर इरादे बुलंद हों तो संसाधनों की कमी कभी ज्ञान के आड़े नहीं आती।
हम बात कर रहे हैं जलगांव स्थित जिला परिषद स्कूल की शिक्षिका उज्ज्वला वाडेकर की, जिन्हें छात्र और ग्रामीण प्यार से 'उज्ज्वला ताई' कहकर पुकारते हैं।
उज्ज्वला ताई का मानना है कि शिक्षा को किताबों के पन्नों में कैद नहीं रहना चाहिए। पारंपरिक रटने की प्रणाली से हटकर उन्होंने व्यावहारिक शिक्षा (Activity-based learning) को अपना हथियार बनाया।
जब गांव के बच्चों को गणित के जटिल सूत्र जैसे परिधि या विज्ञान का सिद्धांत जैसे हवा का दबाव समझ में नहीं आता था, तो उज्ज्वला ताई उन्हें कक्षा में बंद रखने के बजाय गांव की पंचर की दुकान पर ले जाती थीं। टायर के घेरे के जरिए गणित की परिधि और साइकिल के पंप से हवा भरते वक्त दबाव के नियम को बच्चे मिनटों में सीख जाते थे। ठीक इसी तरह, आग लगने के वैज्ञानिक कारणों और उसे बुझाने की तकनीकों को समझाने के लिए उन्होंने पूरे फायर स्टेशन को ही अपना क्लासरूम बना दिया।
शिक्षिका उज्ज्वला वाडेकर जिला परिषद स्कूल के बच्चों को गांव में पंचर बनाने वाले की दुकान पर ले जाकर पंचर कैसे बनता है इसकी पूरी जानकारी देती है। ऐसे ईंट कैसे बनती है इसके लिए ईंट भट्टी, खेती के काम जैसे हल चलाना या बुआई करना उसका लाइव डेमो दिखानों के लिए बच्चों को खेत ले जाती है। दुकान में सामान कैसे खरीदना है और पैसा का हिसाब कैसे होता है जानकारी देने के लिए कभी किराना दुकान तो कभी स्टेशनरी ले जाती।
इसके अलावा धर्म और इतिहास से रूबरू कराने के लिए बच्चों को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी जैस देश के नायकों की जयंती के अवसर पर कार्यक्रमों का आयोजन कर बच्चों को उनकी वेशभूषा पहनाकर इतिहास और नायकों की जानकारी देती हैं। धर्म का ज्ञान देने के लिए स्कूली बच्चों के साथ पंढरपुर वारी निकालती और अन्य धार्मिक आयोजन करती।
ग्रामीण क्षेत्रों बच्चों के मन में अक्सर प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं को लेकर एक डर रहता है। नवोदय विद्यालय और सरकारी स्कॉलरशिप जैसी परीक्षाओं के नाम से ही बच्चे पीछे हटने लगते है। उज्ज्वला वाडेकर ने अपने 31 से अधिक वर्षों के अनुभव में कृतीयुक्त मार्गदर्शन के माध्यम से बच्चों के मन से इस डर को पूरी तरह निकाल फेंका।
जिला परिषद स्कूल की शिक्षिका उज्ज्वला वाडेकर ने खेल-खेल में और जीवंत उदाहरणों के जरिए बच्चों को इस तरह तैयार किया कि इस छोटे से जिला परिषद स्कूल के सैकड़ों बच्चों ने नवोदय और विभिन्न स्कॉलरशिप परीक्षाओं में सफलता के झंडे गाड़े। आज उनके पढ़ाए कई छात्र अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता के नए आयाम गढ़ रहे हैं।
उज्ज्वला वाडेकर का तीन दशकों से अधिक का यह सफर बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। गांव में सुविधाओं का अभाव, बुनियादी ढांचे की कमियां और पुरानी मानसिकता जैसी कई बाधाएं आईं, लेकिन उन्होंने कभी अपने आराम को प्राथमिकता नहीं दी। उनके करियर का पहला दिन हो या आज 31 साल बाद का कोई दिन, उनकी ऊर्जा और पढ़ाने का जुनून आज भी वैसा ही है।
उज्ज्वला वाडेकर की इसी अटूट निष्ठा, दूरदर्शिता और शिक्षा के प्रति अद्भुत समर्पण को देखते हुए उन्हें साल 2014 में सरकार द्वारा 'आदर्श शिक्षिका' सम्मान से नवाजा गया। यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि गांव के हर उस बच्चे की उम्मीद का सम्मान था जिसने उज्ज्वला ताई की उंगली पकड़कर सपने देखना सीखा।
उज्ज्वला ताई का जीवन इस बात का स्पष्ट संदेश देता है कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल डिग्रियां बांटना या बच्चों को साक्षर बनाना नहीं है। असली शिक्षा वह है जो बच्चे के भीतर आत्मविश्वास, जिज्ञासा और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने का साहस पैदा करे। वह अक्सर कहती हैं, "शिक्षा वह नहीं जो आपको सिर्फ पढ़ना सिखाए, शिक्षा वह है जो आपको दुनिया से लड़ना सिखाए।"
शिक्षक दिवस के इस पावन अवसर पर उज्ज्वला वाडेकर की यह प्रेरक यात्रा हमें याद दिलाती है कि एक समर्पित शिक्षक पूरी पीढ़ी की दिशा और दशा बदल सकता है। उन्होंने गांव की धूल भरी गलियों से ज्ञान की जो अलख जगाई है, वह देश के हर उस शिक्षक के लिए एक मिसाल है जो सीमित संसाधनों के बावजूद समाज में एक बड़ा बदलाव लाने का जज्बा रखते हैं।