नागपुर में सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल, विद्यार्थियों के अभाव से जूझ रहे जिला परिषद स्कूल; चिंताजनक तस्वीर

Nagpur Zilla Parishad Schools: नागपुर जिले के कई सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम हो गई है। निजी स्कूलों की बढ़ती लोकप्रियता व सुविधाओं के कारण सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे है।
Questions Raised Over Government Education System in Nagpur: District Council Schools Grapple with Shortage of Students A Concerning Picture
सरकारी स्कूल, जिला परिषद स्कूल, शिक्षा, विद्यार्थी संख्या, नागपुर,(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur Rural Education News: नागपुर एक समय था जब सरकारी स्कूल प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की खान माने जाते थे। आज उच्च पदों पर कार्यरत अधिकांश अधिकारी इन्हीं स्कूलों से शिक्षा प्राप्त कर आगे बढ़े हैं लेकिन अब सरकारी स्कूलों की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण, बेहतर सुविधाओं और निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के आकर्षण के कारण अभिभावक सरकारी स्कूलों से दूरी बना रहे हैं। प्रशासन की निष्क्रयता के चलते जिला परिषद स्कूल केवल नाममात्र के रह गए हैं।

जिले के स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या पर नजर डालें तो स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई देती है। जिले की 257 स्कूलों में केवल 1 से 10 विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। 396 स्कूलों में 11 से 20 विद्यार्थी, जबकि 897 स्कूलों में 21 से 50 विद्यार्थी हैं। वहीं 50 से अधिक विद्यार्थियों वाले 2,409 स्कूल हैं। अर्थात बड़ी संख्या में स्कूल अत्यंत कम विद्यार्थियों के साथ संचालित हो रहे हैं।

कक्षा-वार आंकड़े भी चिंताजनक

कक्षा पहली में 69,289 विद्यार्थी है, जबकि 5वीं तक यह संख्या बढ़कर 77,428 हो जाती है लेकिन छठी कक्षा से विद्यार्थियों की संख्या कम होने लगती है और 7वीं में यह घटकर 64,017 रह जाती है। इसका अर्थ है कि प्राथमिक शिक्षा के बाद बड़ी संख्या में विद्यार्थी पढ़ाई छोड़ रहे हैं। इस ड्रॉपआउट को रोकने के लिए प्रशासन ने क्या ठोस कदम उठाए है? यह सवाल अब भी अनुत्तरित है। 8वीं से 10वीं तक विद्यार्थियों की संख्या में कुछ वृद्धि दिखाई देती है लेकिन 11वीं में यह संख्या फिर घटकर 64,544 रह जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि उच्च माध्यमिक स्तर पर भी विद्यार्थियों को शिक्षा व्यवस्था से जोड़े रखने में तंत्र पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है। 12वीं कक्षा में 66,456 विद्यार्थी है, लेकिन शुरुआती कक्षाओं की तुलना में यह संख्या भी कम है।

करोड़ों का खर्च, परिणाम जीरो

सरकार शिक्षा पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर रही है लेकिन इसका वास्तविक लाभ दिखाई नहीं दे रहा है। स्कूलों की दयनीय स्थिति, घटती विद्यार्थी संख्या और बढ़ती ड्रॉपआउट दर को देखते हुए यह प्रश्न उठ रहा है कि कहीं यह खर्च केवल शिक्षकों के वेतन तक ही सीमित तो नहीं रह गया है।

अंग्रेजी माध्यम, आधुनिक सुविधाएं, अनुशासित प्रबंधन और परिणाम-केंद्रित शिक्षा प्रणाली के कारण निजी स्कूल अधिक भरोसेमंद प्रतीत होते हैं। इसके विपरीत कई सरकारी स्कूलों में निर्षक्रयता, रखरखाव की कमी और जवाबदेही का अभाव देखने को मिलता है। स्थिति सुधारने के लिए प्रशासन को केवल कागजी योजनाएं बनाने के बजाय उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर देना होगा।

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