कच्चे पुंगों से तैयार हुई गणेश प्रतिमा (सोर्स- सोशल मीडिया)
सागर

सागर: कच्चे पुंगों से गणेश की अनोखी कारीगरी, 35 किलो सामग्री, 148 दिन की मेहनत और तैयार हुई 6 फीट की प्रतिमा

Sagar Unique Ganesh Idol: गणेश चतुर्थी के लिए कच्चे पुंगों से गणेश प्रतिमा तैयार की है। करीब 35 किलो कच्चे पुंगों और 28 हजार से अधिक पुंगों से बनी यह प्रतिमा लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

सरजू पटेल, सजल रघुवंशी

Ganesh Idol Made From Raw Pungas: सागर जिले के बीना में जिद, जुनून और कुछ अलग करने की लगन हो तो साधारण चीजों से भी असाधारण कला को आकार दिया जा सकता है। बीना के कटरा वार्ड निवासी मूर्तिकार चौधरी अशोक साहू ने इस बार गणेश चतुर्थी के लिए कच्चे पुंगों से 6 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा तैयार की है। करीब 35 किलो कच्चे पुंगों और 28 हजार से अधिक पुंगों से बनी यह प्रतिमा लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। खास बात यह है कि प्रतिमा तैयार करने में उन्हें करीब 148 दिन का समय लगा।

अशोक साहू ने बताया कि प्रतिमा बनाने का काम 1 अप्रैल से शुरू किया था और 25 अगस्त तक लगातार मेहनत की। कच्चे पुंगों में बारिश के दौरान नमी आने की वजह से उन्होंने प्रतिमा का निर्माण बारिश शुरू होने से पहले ही पूरा कर लिया। इसके बाद प्रतिमा को सुरक्षित रखा गया। उनका कहना है कि इस काम में समय के साथ धैर्य और बारीकी सबसे ज्यादा जरूरी थी।

खाने वाले कच्चे पुंगों से बनाई प्रतिमा

प्रतिमा बनाने में जिस सामग्री का इस्तेमाल किया गया है, वह बच्चों के खाने वाले कच्चे पुंगे हैं। हजारों पुंगों को व्यवस्थित तरीके से जोड़कर गणेश प्रतिमा का स्वरूप दिया गया। करीब 6 फीट ऊंची प्रतिमा को देखने के लिए अभी से पहुंच रहे हैं और बनाने का तौर तरीका पूछ रहे हैं।अशोक साहू का दावा है कि कच्चे पुंगों से इतनी बड़ी गणेश प्रतिमा का निर्माण अपने आप में अनोखा प्रयास है। उनकी कोशिश पारंपरिक पीओपी और अन्य ऐसी सामग्रियों के विकल्प के तौर पर प्राकृतिक सामग्री से गणेश प्रतिमा बनाने की है।

39 तरह की इको-फ्रेंडली प्रतिमाएं बना चुके हैं

अशोक साहू पिछले कई वर्षों से राम-जानकी साहू समाज मंदिर में अलग-अलग प्राकृतिक और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री से गणेश प्रतिमाएं बनाते आ रहे हैं। अब तक वे करीब 39 प्रकार की इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं बना चुके हैं। इनमें घी, मूंगफली, लाई, दाल, मखाना, बूंदी के लड्डू, चना, नारियल, साबूदाना, माचिस की तीली, फूल, धागे की रील, धनिया, कैथ, नमकीन सेव, चूड़ी, बटन, डिस्पोजल, सितारा, ज्वार, राई, मक्का, मोमबत्ती और सोयाबीन सहित कई अलग-अलग सामग्रियों से बनाई गई प्रतिमाएं शामिल हैं।

विसर्जन के बाद प्राकृतिक रूप से हो जाती हैं नष्ट

अशोक साहू के अनुसार उनकी बनाई गई प्रतिमाओं का उद्देश्य केवल आकर्षक कलाकृति तैयार करना नहीं, बल्कि लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना भी है। प्राकृतिक खाद्य सामग्री से बनी प्रतिमाएं विसर्जन के बाद प्रकृति में आसानी से मिल जाती हैं। इससे जलस्रोतों में प्रदूषण कम करने का संदेश भी लोगों तक पहुंचता है।

गणमान्य लोगों ने की सराहना

पूर्व मंत्री प्रभु सिंह ठाकुर ने अशोक साहू की कला की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने अलग-अलग सामग्री से प्रतिमाएं बनाकर बीना का नाम रोशन किया है। राष्ट्रीय कवि सुनील समैया ने उन्हें अद्भुत कलाकार बताते हुए शहरवासियों से उनकी कलाकृतियां देखने की अपील की। नगर पालिका अध्यक्ष लता सकवार ने कहा कि पर्यावरण को ध्यान में रखकर इस तरह की प्रतिमाएं तैयार करना प्रेरणादायक पहल है। साहू समाज अध्यक्ष सुरेंद्र साहू सहित अन्य लोगों ने भी अशोक साहू के प्रयास की सराहना करते हुए शासन और जिला प्रशासन से उन्हें सम्मानित करने और इस तरह की कला को प्रोत्साहित करने की बात कही।

गिनीज बुक में दर्ज कराने की तैयारी

अशोक साहू की इस अनोखी प्रतिमा को लेकर अब इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराने की दिशा में प्रयास किए जाने की बात कही जा रही है। यदि यह प्रयास सफल होता है तो बीना के लिए यह बड़ी उपलब्धि होगी। अशोक साहू का कहना है कि उनका उद्देश्य अपनी कला के जरिए बीना की पहचान को आगे बढ़ाना और लोगों को पर्यावरण के अनुकूल त्योहार मनाने के लिए प्रेरित करना है।

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