माघ मास में तिल से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान करते श्रद्धालु 
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माघ मास में क्यों जरूरी है तिल का उपयोग? जानें इसके पीछे का पौराणिक रहस्य

Importance of Til: हिंदू धर्म में माघ मास का विशेष महत्व माना गया है। इस दौरान तिल का उपयोग दान, स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तिल को पवित्र माना गया है।

प्रीति शर्मा

Sesame Seeds Significance: कड़ाके की ठंड और माघ का पावन महीना! हिंदू धर्म और आयुर्वेद दोनों में ही इस समय तिल को संजीवनी माना गया है। मकर संक्रांति से लेकर षटतिला एकादशी तक तिल का दान और सेवन न केवल पापों का नाश करता है बल्कि शीतजनित रोगों से भी रक्षा करता है।

माघ मास की शुरुआत के साथ ही उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड अपने चरम पर होती है। इस मौसम में वात दोष बढ़ने से शरीर में सूखापन, जोड़ों का दर्द और थकान जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। धर्म शास्त्रों और आयुर्वेद के विशेषज्ञों का मानना है कि इन सभी समस्याओं का इकलौता और अचूक समाधान तिल में छिपा है।

धर्म और आस्था

तिल के 6 विशेष प्रयोग (षटतिला) धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माघ के महीने में जो लोग पवित्र नदियों में स्नान नहीं कर पाते उन्हें घर पर ही पानी में तिल मिलाकर स्नान करना चाहिए। शास्त्रों में तिल के छह प्रकार के उपयोग का वर्णन मिलता है जिसे षटतिला कहा जाता है।

  • तिल मिश्रित जल से स्नान।
  • शरीर पर तिल का उबटन (लेप) लगाना।
  • तिल से हवन करना।
  • तिल का तर्पण (पितरों के लिए)।
  • तिल का दान।
  • तिल से बने व्यंजनों का सेवन।

माना जाता है कि इन कार्यों से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। मकर संक्रांति और गणेश चतुर्थी जैसे पर्वों पर भगवान को तिल के लड्डू अर्पित करना विशेष पुण्यदायी है।

आयुर्वेद का नजरिया

सेहत का पावरहाउस आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार तिल की तासीर गर्म और तैलीय होती है जो शरीर में प्राकृतिक गर्मी पैदा करती है। यह वात और कफ दोष को संतुलित कर सर्दी-खांसी और कमजोरी को दूर रखता है। तिल में कैल्शियम, आयरन, विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा होती है जो हड्डियों को फौलाद जैसी मजबूती देते हैं और दांतों को स्वस्थ रखते हैं।

त्वचा और पाचन के लिए वरदान तिल का तेल न केवल त्वचा को नरम और जवां रखता है बल्कि इसके एंटी-एजिंग गुण झुर्रियों को भी रोकते हैं। फाइबर से भरपूर होने के कारण यह पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है और कब्ज जैसी पुरानी समस्याओं से राहत दिलाता है। आयुर्वेद में इसे सर्वदोष हारा कहा गया है क्योंकि यह शरीर के हर ऊतक को पोषण प्रदान करता है।

चूंकि तिल गर्म होता है इसलिए पित्त प्रकृति के लोगों को इसका सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

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