कांसेप्ट फोटो (सौ. से सोशल मीडिया) 
जम्मू कश्मीर

बजट खर्च करने में फिसड्डी साबित हो रहा है जम्मू और कश्मीर, कैसे बनेगा 'धरती का स्वर्ग'

अनुच्छेद 370 हटने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव का साक्षी बनने जा रहे जम्मू और कश्मीर का आर्थिक परिदृश्य उतना अच्छा नहीं, जितना उसका गुणगान किया जाता है। यहां बजट का 40 प्रतिशत ही खर्चा हो पा रहा है। ऐसे में राज्य की स्थिति का अंदाजा अपने आप लगाया जा सकता है...

विजय कुमार तिवारी

श्रीनगर : जम्मू-कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार इसे और बेहतर बनाने की कोशिश में जुटी हुई है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा है। अगर यहां पर बजट खर्च के आंकड़ों को देखा जाए तो पता चलेगा कि जम्मू कश्मीर अपने बजट को भी खर्च करने में असफल रहा है। यहां बजट का केवल 40 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च हो पाया है। ऐसी स्थिति में सरकार का ख्वाब कैसे पूरा होगा और सरकारी योजनाएं जन-जन तक कैसे पहुंचेगी, यह सोचने वाली बात है।

अनुच्छेद 370 हटने के बाद पहले विधानसभा चुनाव का साक्षी बन रहे जम्मू और कश्मीर का आर्थिक परिदृश्य मिली-जुली तस्वीर पेश कर रहा है। इस केंद्र शासित प्रदेश में घोषित पूंजीगत व्यय की तुलना में बहुत कम खर्च देखा गया है। 2018- 19 से परिसंपत्ति निर्माण पर भी वास्तविक व्यय लगातार अनुमानों से कम रहा है। औसतन जम्मू-कश्मीर अपने अनुमानित पूंजीगत व्यय का केवल 40 प्रतिशत ही खर्च कर पाया है। उदाहरण के लिए ने 2022-23 के लिए पूंजीगत व्यय में 41,335 करोड़ का अनुमान लगाया था, लेकिन वास्तविक खर्च 14,666 करोड़ था। वित्त वर्ष 22 में 240,000 करोड़ के बजट में खर्च सिर्फ 15,309 करोड़ रुपये ही हुए।

जीएसडीपी खर्च सबसे अधिक

इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर औसत भारतीय राज्य केंद्र शासित प्रदेश की तुलना में अपने आर्थिक संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए आवंटित करता है। इसने अपने सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 6.43 प्रतिशत पूंजीगत व्यय पर खर्च किया, जबकि वित्त वर्ष 2023 में सभी राज्यों का राष्ट्रीय औसत 4.53 प्रतिशत रहा। हालांकि संशोधित अनुमान के तहत राज्य का पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2024 में जीएसडीपी के 13 प्रतिशत से अधिक और वित्त वर्ष 2025 के बजट अनुमान में 14 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है।

ऐसे आ रहा है पैसा

जम्मू-कश्मीर के पूंजीगत व्यय का तीन-चौथाई हिस्सा केंद्र सरकार के आर्थिक पैकेज और ऋणों के पुनर्भुगतान से संचालित होता है। 2015 में पुनर्निर्माण योजना के तहत घोषित प्रधानमंत्री विकास पैकेज का शुरुआती परिव्यय 1,80,000 करोड़ से अधिक है, जो प्रत्येक वर्ष कुल पूंजीगत व्यय का 40 प्रतिशत से अधिक है। चालू वर्ष के लिए इस कार्यक्रम के तहत 7 वर्षों में सर्वाधिक आवंटन 16,500 करोड़ है। अनुच्छेद 370 के खात्मे और पुनर्गठन के बाद केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के पास 58,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएं बची हैं। अन्य केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं के तहत व्यय पूंजीगत व्यय का 21 प्रतिशत हिस्सा बनता है।

घरेलू-विदेशी निवेश भी है बढ़ा

केंद्र शासित प्रदेश में घरेलू और विदेशी दोनों तरह के निवेश को लाने के लिए केंद्र ने कई औद्योगिक नीतियां और योजनाएं शुरू की हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किए गए जम्मू-कश्मीर बजट के अनुसार, 18, 185 करोड़ के निवेश और 46.857 लोगों को रोजगार देने वाली कुल 889 इकाइयों ने पहले ही जमीनी स्तर पर काम शुरू कर दिया है। कुछ रिपोर्टों से पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर को 90,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव मिले हैं और पिछले तीन वर्षों में इसने 15,000 करोड़ का औद्योगिक निवेश मिला है। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर में स्टार्टअप इकोसिस्टम अपेक्षाकृत छोटा है। 2022 में इस क्षेत्र में आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की संख्या 200 से भी कम थी।

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