पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया, नियुक्तियां, वरिष्ठता और प्रमोशन दोबारा नहीं खुलेंगे
OBC क्रीमी लेयर तय करने में माता-पिता के पद और उसकी श्रेणी पर भी करना होगा विचार
UPSC के अनुशंसित 958 उम्मीदवारों के सेवा आवंटन में 11 मार्च के फैसले के सिद्धांत होंगे लागू
Supreme Court Verdict Creamy Layer Among OBC: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के क्रीमी लेयर निर्धारण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम स्पष्टीकरण जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि OBC उम्मीदवारों की क्रीमी लेयर स्थिति तय करने के लिए केवल माता-पिता की वेतन आय को आधार नहीं बनाया जा सकता, बल्कि उनके पद की श्रेणी और स्थिति पर भी विचार करना होगा। हालांकि, इस फैसले के आधार पर पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों और वरिष्ठता को दोबारा नहीं खोला जाएगा। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जिन मामलों में वरिष्ठता और पदोन्नति पहले ही तय हो चुकी है, उन पर इस फैसले का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से दाखिल विविध आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्टीकरण दिया। केंद्र सरकार ने 11 मार्च 2026 को दिए गए फैसले के प्रभाव और उसे लागू करने के तरीके को लेकर अदालत से स्पष्टता मांगी थी।
केवल वेतन से तय नहीं होगी क्रीमी लेयर की स्थिति
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को दिए अपने फैसले में कहा था कि OBC उम्मीदवार के क्रीमी लेयर में आने या नहीं आने का निर्धारण केवल उसके माता-पिता की वेतन आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के सरकारी पद की श्रेणी और उसकी स्थिति को भी देखना जरूरी है।
यह विवाद 8 अगस्त 1993 के कार्यालय ज्ञापन और 14 अक्टूबर 2004 को जारी स्पष्टीकरण से जुड़ा है। 1993 के नियमों के अनुसार, क्रीमी लेयर का निर्धारण संबंधित श्रेणी और माता-पिता के पद के आधार पर किया जाना चाहिए। वहीं, 2004 के स्पष्टीकरण में PSU, बैंक, विश्वविद्यालय और निजी संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों के मामलों में वेतन आय को लेकर अलग व्यवस्था का प्रावधान था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 2004 का स्पष्टीकरण 1993 की मूल नीति में ऐसी अतिरिक्त शर्त नहीं जोड़ सकता, जो उसमें पहले से मौजूद नहीं है। अदालत ने यह भी माना था कि समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग-अलग व्यवहार करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के सिद्धांत से जुड़ा सवाल खड़ा कर सकता है।
पहले हो चुकी भर्तियां और नियुक्तियां नहीं खुलेंगी
केंद्र सरकार ने अदालत के सामने दलील दी थी कि 11 मार्च के फैसले को पिछली तारीख से लागू करने पर केंद्र और 18 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में पहले से पूरी हो चुकी भर्तियों, नियुक्तियों और शैक्षणिक संस्थानों में दाखिलों पर असर पड़ सकता है।
सरकार के मुताबिक, 2016 से 2025 के बीच केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में 5.69 लाख से अधिक आरक्षित पद भरे गए, जिनमें लगभग 3.70 लाख OBC रिक्तियां शामिल थीं। इन भर्तियों में उस समय लागू नियमों और दिशा-निर्देशों का पालन किया गया था।
केंद्र ने आशंका जताई थी कि फैसले को पिछली तारीख से लागू करने पर वर्ष 2012 से हुई सिविल सेवा परीक्षाओं के सेवा आवंटन पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। इससे पहले से नियुक्त अधिकारियों की वरिष्ठता, कैडर आवंटन और पदोन्नति प्रभावित हो सकती है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 11 मार्च का फैसला अपने आप में पहले पूरी हो चुकी चयन और नियुक्ति प्रक्रियाओं को दोबारा खोलने का आधार नहीं बनेगा। हालांकि, जिन लोगों के समान दावे किसी न्यायालय, न्यायाधिकरण या सक्षम प्राधिकरण के सामने लंबित हैं, उन पर संबंधित मंच उनके तथ्यों और पात्रता के आधार पर फैसला कर सकते हैं।
CSE-2025 के 958 उम्मीदवारों के सेवा आवंटन पर निर्देश
इस मामले में सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2025 को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिया गया है। केंद्र सरकार ने UPSC की ओर से अनुशंसित 958 उम्मीदवारों के सेवा आवंटन को लेकर अंतरिम राहत मांगी थी।
सरकार का कहना था कि सेवा आवंटन में देरी होने से उम्मीदवारों का फाउंडेशन कोर्स, प्रशिक्षण और सेवा में शामिल होने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
अदालत ने कहा कि सिविल सेवा परीक्षा 2025 का परिणाम 6 मार्च 2026 को घोषित हो चुका है, लेकिन सेवाओं का आवंटन अभी अंतिम रूप नहीं ले पाया है। ऐसे में 11 मार्च के फैसले को लागू करने से रोकने का कोई ठोस आधार नहीं है। इसलिए इस परीक्षा के माध्यम से चयनित OBC उम्मीदवारों के सेवा आवंटन में क्रीमी लेयर से संबंधित वही सिद्धांत लागू होंगे, जिनकी व्याख्या 11 मार्च के फैसले में की गई थी।
सरकार को नीति बनाने की स्वतंत्रता
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार संविधान और अदालत द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप आरक्षण तथा क्रीमी लेयर से संबंधित अपनी नीति बनाने के लिए स्वतंत्र है। अदालत ने सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों के पदों के बीच समानता निर्धारित करने या इस संबंध में हितधारकों से बातचीत पूरी करने के लिए कोई समयसीमा तय करने से इनकार कर दिया।
केंद्र सरकार ने विभिन्न संस्थानों के पदों की समानता तय करने और क्रीमी लेयर निर्धारण की एक समान व्यवस्था विकसित करने के लिए दो साल का समय मांगा था।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ OBC क्रीमी लेयर निर्धारण में पद की श्रेणी को महत्वपूर्ण माना, वहीं दूसरी तरफ पहले से पूरी हो चुकी भर्तियों, नियुक्तियों और वरिष्ठता को सुरक्षित रखने का स्पष्ट संदेश दिया है। अदालत के स्पष्टीकरण से अब CSE-2025 के सेवा आवंटन में भी 11 मार्च 2026 के फैसले में निर्धारित सिद्धांतों का पालन किया जाएगा।