Parliament Monsoon Session: 20 जुलाई से संसद के मानसून सत्र की शुरुआत होने वाली है। इससे पहले केंद्र सरकार ने सभी राजनीतिक दलों की सर्वदलीय बैठक बुलाई। बैठक में सरकार ने सभी दलों से अपील की कि संसद की कार्यवाही शांतिपूर्ण और सुचारु रूप से चलाने में सहयोग करें। इस बार सरकार कई बड़े और महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की तैयारी में है। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा। करीब चार सप्ताह चलने वाले इस सत्र में कुल 19 बैठकें होंगी। इस दौरान सरकार कई अहम बिल संसद में पेश कर सकती है। आइए आपको बताते हैं कि सरकार मानसून सत्र में कौन-कौन से बिल सदन में पेश कर सकती है? सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां क्या है? केंद्र ने इससे निपटने के लिए क्या तैयारियां की है?
इस बार सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता परिसीमन विधेयक को पारित कराना है। इसके साथ ही महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को भी आगे बढ़ाने की तैयारी है। सरकार चाहती है कि इन दोनों बड़े विधेयकों को इस सत्र में मंजूरी मिल जाए। संविधान संशोधन वाले विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है। फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के पास इतनी संख्या नहीं है। इसी वजह से सरकार उन दलों और सांसदों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है जो विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं।
हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) के कुछ बागी सांसदों ने एनडीए का समर्थन करने का संकेत दिया है। इसके अलावा बीजू जनता दल (BJD) के कुछ राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे और अन्य राजनीतिक बदलावों से सरकार की स्थिति पहले से मजबूत मानी जा रही है।
जानकारी के मुताबिक, सरकार अब एम के स्टालिन की द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) का समर्थन हासिल करने की कोशिश में भी लगी है, जो तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस द्वारा गठबंधन तोड़कर सी जोसेफ विजय के तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) को समर्थन देने से कांग्रेस से नाराज चल रही है। माना जा रहा है कि अगर डीएमके और कुछ अन्य क्षेत्रीय दल साथ आते हैं तो सरकार के लिए जरूरी बहुमत जुटाना आसान हो सकता है। इसी वजह से लगातार राजनीतिक बातचीत जारी है।
सरकार पिछले बजट सत्र में जरूरी संख्या बल नहीं जुटा सकी थी। इसके कारण महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो पाया। यह मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका माना गया क्योंकि लंबे समय बाद सरकार का कोई महत्वपूर्ण विधेयक संसद में पास नहीं हो सका था। इस बार संसद का राजनीतिक समीकरण पहले जैसा नहीं है। तृणमूल कांग्रेस में मतभेद, कांग्रेस और डीएमके के बीच बढ़ी दूरी और शिवसेना (यूबीटी) में टूट का असर संसद की संख्या पर पड़ा है। इससे एनडीए की ताकत बढ़ी है जबकि विपक्षी इंडिया गठबंधन की स्थिति कुछ कमजोर हुई है।
सरकार ने परिसीमन को लेकर नया फॉर्मूला तैयार किया है। इसके तहत लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर करीब 850 करने का प्रस्ताव है। इनमें लगभग 815 सीटें राज्यों और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी। सरकार का कहना है कि इससे किसी राज्य का मौजूदा अनुपात नहीं बदलेगा।सरकार ने साफ किया है कि नए परिसीमन के बाद भी दक्षिण भारत की संसद में हिस्सेदारी लगभग पहले जैसी ही रहेगी। यानी सीटों की संख्या तो बढ़ेगी, लेकिन कुल प्रतिशत में बहुत बड़ा बदलाव नहीं होगा। इससे दक्षिणी राज्यों की चिंता दूर करने की कोशिश की जा रही है।
प्रस्ताव के मुताबिक तमिलनाडु की लोकसभा सीटें 39 से बढ़कर 59 हो सकती हैं। कर्नाटक की सीटें 28 से 42, आंध्र प्रदेश की 25 से 38, तेलंगाना की 17 से 26 और केरल की 20 से 30 होने का प्रस्ताव है। इसी अनुपात में राज्यों की विधानसभा सीटें भी बढ़ायी जाएंगी। सरकार का मानना है कि सीटों का अनुपात बनाए रखने वाला यह फॉर्मूला कई विपक्षी दलों की आपत्तियां कम कर सकता है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को छोड़कर कई अन्य विपक्षी दल इस विधेयक पर सरकार का साथ दे सकते हैं। मानसून सत्र में महिलाओं के आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन विधेयक भी सरकार की प्राथमिकता में रहेगा। सरकार चाहती है कि इस विधेयक पर भी चर्चा हो और इसे संसद से मंजूरी मिल सके।
सरकार 130वां संविधान संशोधन विधेयक भी पेश कर सकती है। प्रस्ताव के अनुसार यदि किसी मुख्यमंत्री, मंत्री या प्रधानमंत्री को किसी गंभीर आपराधिक मामले में लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़े, तो उसका पद अपने आप समाप्त हो जाएगा।
मानसून सत्र में 'वन नेशन, वन इलेक्शन' विधेयक, एफसीआरए संशोधन विधेयक, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, एंटीॉ-डोपिंग विधेयक, सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा विधेयक, कॉरपोरेट कानून, सिक्योरिटीज मार्केट कोड और कोड ऑन वेजेज से जुड़े कई महत्वपूर्ण विधेयक भी पेश किए जा सकते हैं।
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इस बार का मानसून सत्र सरकार और विपक्ष दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार जहां अपने बड़े विधेयकों को पारित कराना चाहती है, वहीं विपक्ष भी इन मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में आने वाले सप्ताह संसद में राजनीतिक रूप से काफी अहम रहने वाले हैं।