

LJP-R will contest all seats in Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास पासवान) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने एक बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं, उनकी पार्टी उत्तराखंड और पंजाब चुनाव को लेकर भी अपनी रणनीतियां बनाने में जुटी है। बिहार के हाजीपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री और एलजेपी-आर प्रमुख ने खुद इस बात की घोषणा की है।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर हम चुनाव लड़ेंगे। यूपी में चुनाव लड़ने को लेकर चिराग पासवान ने कहा कि जब में उत्तर प्रदेश में पंडित से लेकर पासवान की बात करता हूं, तो यह वह ब्रैकेट है जिसके बीच हर जाति, धर्म और समुदाय के लोग समाहित होते हैं। यूपी में एनडीए से अलग चुनाव लड़ने के चिराग पासवान के फैसले पर कई सवाल उठ रहे हैं। क्या एनडीए में फूट की चिंगारी तेज हो गई है... या यह अखिलेश यादव के पीडीए वोटरों को तोड़ने की कोई रणनीति? आइए इस एक्सप्लेनर के जरिए इसे समझते हैं।
चिराग पासवान ने अपने बयान में कहा कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर मजबूती से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। बिहार, झारखंड और नागालैंड के बाद अब LJP-R अपने संगठन का विस्तार उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में करने जा रही है। कुछ समय पहले लखनऊ की सड़कों पर पार्टी की ओर से पोस्टर भी लगाए गए थे, जिस पर लिखा था- 'क्यों मांगे उधार, अब अपना नेता तैयार'। चिराग पासवान के इस कदम ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है।
उत्तर प्रदेश में अमूमन लोक जनशक्ति पार्टी- रामविलास को एक स्थानीय या जाति विशेष (पासवान केंद्रित) की पार्टी के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन इस बार चिराग पासवान ने इस धारणा को तोड़ने के लिए 'पंडित से लेकर पासवान तक' का एक नया राजनीतिक दायरा पेश किया है। इस नारे के जरिए वे समाज के सबसे ऊपरी तबके (सवर्ण) और सबसे निचले तबके (दलित) को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे साल 2007 में मायावती द्वारा किए गए 'सोशल इंजीनियरिंग' (ब्राह्मण-दलित गठजोड़) के प्रयोग की तरह देख रहे हैं, जिसने तब बसपा को पूर्ण बहुमत दिलाया था।
गौरतलब है कि चिराग पासवान भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं। हालांकि, अब उनके द्वारा उत्तर प्रदेश की सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद गठबंधन में फूट के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने इस पर कूटनीतिक रुख अपनाया है। चिराग पासवान का कहना है कि फिलहाल पार्टी अगले 2-3 महीनों तक बूथ स्तर पर अपना संगठन खड़ा कर रही है और सदस्यता अभियान चलाएगी।
किसी भी छोटे दल के लिए सभी सीटों पर तैयारी का दावा करना एक पुरानी राजनीतिक कूटनीति है। इससे पार्टी गठबंधन के बड़े सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे में ज्यादा मजबूती से मोलभाव कर पाती है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का यह भी तर्क है कि अगर वे सभी 403 सीटों पर संगठन मजबूत करते हैं, तो गठबंधन होने की स्थिति में उनके इस जमीनी काम का फायदा एनडीए के अन्य सहयोगियों को भी मिलेगा। हालांकि, कार्यकर्ताओं का साफ कहना है कि अगर गठबंधन नहीं हुआ, तो पार्टी अकेले ही मैदान में उतरेगी।
इस फैसले को समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के खिलाफ एक रणनीतिक घेराबंदी के तौर पर भी देखा जा रहा है। लोकसभा चुनाव में विपक्ष (सपा-कांग्रेस) ने 'संविधान और आरक्षण खतरे में है' का नैरेटिव चलाकर दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा हासिल किया था। चिराग पासवान सीधे तौर पर विपक्ष पर निशाना साध रहे हैं कि उन्होंने दलितों को भ्रमित कर वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया। एक युवा दलित चेहरे के रूप में चिराग यूपी में उतरकर अखिलेश के इस नए दलित-पिछड़ा (PDA) समीकरण को चुनौती देना चाहते हैं।
वहीं, उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का ग्राफ पिछले कुछ चुनावों से लगातार नीचे गिरा है। मायावती के कमजोर होने से यूपी की राजनीति में दलित नेतृत्व का जो वैक्यूम पैदा हुआ है, चिराग पासवान खुद को एक पढ़े-लिखे, आधुनिक और राष्ट्रीय स्तर के दलित चेहरे के रूप में पेश कर उसे भरना चाहते हैं। विशेष रूप से उनका ध्यान गैर-जाटव दलित (जैसे पासी, पासवान, धोबी, कोरी) मतदाताओं पर है।