

Political equation of Western Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव फरवरी से मार्च 2027 के बीच प्रस्तावित है। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल मई 2027 में समाप्त हो रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राज्य में अभी से ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। 3 सितंबर को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जयंत चौधरी की नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने स्वाभिमान रैली का आयोजन किया। लेकिन सवाल उठता है कि जंयती चौधरी की पार्टी ने इस कार्यक्रम का नाम स्वाभिमान रैली क्यों रखा?
हाल में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सहारनपुर दौरे के दौरान जंयत चौधरी पर निशाना साधते हुए उन्हें 'चवन्नी' (पलटी मारने वाला) बताया था। आरएलडी ने अखिलेश यादव के इसी बयान को जयंत चौधरी, उनके परिवार और पश्चिमी यूपी के किसानों व जाट समाज के अपमान और 'स्वभिमान' से जोड़कर देखा।
स्वाभिमान रैली में बोलते हुए जयंत चौधरी ने चौधरी चरण सिंह की विचारधारा को नमन करते हुए कहा कि उनका लक्ष्य किसान, कमेरा और मजदूर वर्ग को एकजुट करना है। उन्होंने चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न मिलने को किसान समाज के लिए सबसे बड़ा सम्मान बताया। विपक्षी दलों द्वारा की गई टिप्पणियों का करारा जवाब देते हुए जयंत चौधरीन ने कहा कि आरएलडी सही दिशा में काम कर रही है।
जयंत चौधरी ने कहा कि वह कभी किसी को अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहते और उनकी राजनीति का आधार किसी को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि विकास और भाईचारे को बढ़ावा देना है। उन्होंने अंत में जनता से आगामी विधानसभा चुनावों के लिए एकजुट होकर काम करने का आह्वान किया।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'चौधरी परिवार' की शुरुआत और उसकी नींव चौधरी चरण सिंह ने 1929 के दशक में स्वतंत्रता संग्राम और किसानों के अधिकारों के लड़ाई के साथ रखी थी। चौधरी चरण सिंह का जन्म 1902 में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के नूरपुर में एक मिडिल क्लास किसान परिवार में हुआ था।
साल 1923 में उन्होंने साइंस में ग्रेजुएशन किया और 1925 में आगरा यूनिवर्सिटी से पोस्ट-ग्रेजुएशन किया। लॉ की ट्रेनिंग भी ली और फिर गाजियाबाद में प्रैक्टिस शुरू की। 1929 में वे मेरठ आ गए और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए।
छपरौली सीट से पहली बार विधायक
चौधरी चरण सिंह पहली बार 1937 में छपरौली सीट से यूपी विधानसभा के लिए चुने गए और 1946, 1952, 1962 और 1967 में इसी सीट का प्रतिनिधित्व किया। 1946 में पंडित गोविंद बल्लभ पंत की सरकार में वे पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बने और रेवेन्यू, मेडिकल और पब्लिक हेल्थ, जस्टिस, सूचना जैसे कई विभागों में काम किया।
1951 में पहली बार बने कैबिनेट मंत्री
जून 1951 में उन्हें यूपी कैबिनेट में मंत्री बनाया गया और जस्टिस और सूचना विभाग का चार्ज दिया गया। बाद में उन्होंने 1954 में डॉ. संपूर्णानंद की कैबिनेट में राजस्व और कृषि मंत्री के तौर पर पद संभाला। जब अप्रैल 1959 में उन्होंने इस्तीफा दिया, तो वे राजस्व और परिवहन मंत्री का चार्ज संभाल रहे थे।
यूपी सीएम के तौर पर उनका कार्यकाल
पहली बार: अप्रैल 1967 से फरवरी 1968 तक
दूसरी बार: फरवरी 1970 से अक्टूबर 1970 तक
चौधरी चरण सिंह ने 1938 में कृषि उपज बाजार विधेयक विधानसभा में पेश किया, जिसका उद्देश्य किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचाना था। 1952 में यूपी के राजस्व मंत्री के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लागू किया, जिसने उन्हें ग्रामीण इलाकों और किसानों का सर्वमान्य नेता बना दिया।
गैर-कांग्रेस राजनीति का नेतृत्व
साल 1967 में उन्होंने कांग्रेस से नाता तोड़कर भारतीय क्रांति दल (BKD) की नींव रखी और यूपी के पहले गैर-कांग्रेस मुख्यमंत्री बने। यहीं से पश्चिमी यूपी में एक मजबूत क्षेत्रीय और किसान-आधारित राजनीतिक धुरी स्थापित हुई। साल 1979 में वे देश के पांचवें प्रधानमंत्री बने और उनकी राजनीति का केंद्र हमेशा पश्चिमी यूपी का जाटलैंड और ग्रामीण किसान वर्ग रहा।
चौधरी साहब की राजनीतिक विरासत
चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद उनके बेटे चौधरी अजित सिंह ने राष्ट्रीय लोकदल (RLD) की स्थापना कर इस राजनीतिक विरासत को संभाला। मौजूदा समय में उनके पोते जयंत चौधरी इस परिवार की राजनीतिक विरासत व पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। वहीं, स्वाभिमान रैली के जरिए उनकी पत्नी चारू चौधरी की राजनीतिक एंट्री को आरएलडी का मास्टस्ट्रोक के तौर पर देखा जा रहा है।
वेस्टर्न यूपी की राजनीति में चौधरी परिवार (राष्ट्रीय लोकदल) का पुराना समीकरण पूरी तरह टूटने के बजाय एक नया स्वरूप में बदल रहा है। जहां एक तरफ समाजवादी पार्टी से अलग होने के बाद उनके पुराने 'जाट-मुस्लिम' और 'जाट-यादव' वोटरों में टूट आई है, वहीं, जयंत चौधरी एनडीए गठबंधन के साथ मिलकर अन्य जातियों को जोड़कर एक नया गणित तैयार करने में जुटे हैं।
त्यागी और ब्राह्मण वोटरों पर नजर
आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले जयंत चौधरी की पार्टी ने केसी त्यागी और त्रिलोकी त्यागी जैसे नेताओं पर बड़ा दांव खेला है। आरएलडी का यह कदम पश्चिमी यूपी के रसूखदार त्यागी और ब्राह्मण वोटरों के साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोटर निर्णायक
2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या 71,217,132 है, जिसमें से 72.29% हिंदू और 26.21% मुस्लिम हैं। वेस्टर्न यूपी के आठ जिलों में मुस्लिम आबादी का हिस्सा 1951 में 29.93% से बढ़कर 2011 में 40.43% हो गया है। यह राजनीति में विवाद का विषय रहा है, जिसमें हिंदू समूहों की ओर से जनसंख्या नियंत्रण बिल की मांग उठाई जा रही है।
सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले 8 जिले
सहारनपुर
मुजफ्फरनगर
बिजनौर
मुरादाबाद
रामपुर
ज्योतिबा फुले नगर
मेरठ
बरेली
RLD के स्वाभिमान रैली के क्या मायने?
उत्तर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रीय लोक दल ने स्वाभिमान रैली के जरिए पार्टी के शक्ति प्रदर्शन और राजनीति जमीन को मजबूत करने का स्पष्ट संकेत दिया। वहीं, राजनीतिक जानकारों को मानना है कि इस रैली के जरिए जयंत चौधरी बीजेपी को यह संदेश देना चाहते हैं कि एनडीए में वह भी एक प्रमुख दावेदार हैं, ताकि सीट बंटवारें में उनकी पार्टी और जनाधार को विशेष जगह मिल सके।
वहीं, पश्चिमी यूपी में ऐसी कई विधानसभा सीटे हैं, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। ऐसे में नए समीकरण के साथ चुनावी लड़ाई की तैयारी में जुटी आरएलडी को कितना फायदा या नुकसान हो सकता है? इसका आंकलन तो चुनावी नतीजे के बाद ही किया जा सकता है।