Highlights:
भारत को हर साल 36 से 40 नए फाइटर जेट की जरूरत है।
निजी क्षेत्र हर साल 12 से 18 अतिरिक्त जेट की आपूर्ति करने में मदद कर सकता है।
GE एयरोस्पेस 40 वर्षों से भारत के विमानन क्षेत्र का हिस्सा रहा है।
Jet Production GE Aerospace F404 Engine: पश्चिमी देशों की तुलना में, भारत के पास अभी भी आधुनिक हथियारों और लड़ाकू विमानों का बड़ा जखीरा नहीं है। लड़ाकू विमानों की कमी भारतीय वायु सेना के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। जैसे-जैसे पुराने विमान जैसे मिग-29, मिराज-2000 और जगुआर सेवा से बाहर हो रहे हैं, नए लड़ाकू विमानों को शामिल करना अनिवार्य हो गया है।
पूर्व वायु सेना प्रमुख, एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह के अनुसार, इस कमी को पूरा करने और अपनी मौजूदा परिचालन क्षमता बनाए रखने के लिए भारत को हर साल 36 से 40 नए लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है। इस संदर्भ में, तेजस के उत्पादन को बढ़ाने और भारत के भीतर ही इसके इंजनों के रखरखाव और मरम्मत के प्रयास कितने महत्वपूर्ण हैं?
पूर्व भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह के अनुसार, बताया कि पुराने विमानों को हटाने और मौजूदा कमी को पूरा करने के लिए भारत को हर साल 36 से 40 नए फाइटर जेट की जरूरत है। मेक इन इंडिया के तहत भारत ने अमेरिकी कंपनी के साथ एक बड़ा समझौता भी किया है।
'मेक इन इंडिया' के तहत भारत ने अमेरिकी कंपनी GE एयरोस्पेस के साथ एक समझौता किया है। इसके तहत तेजस फाइटर जेट में इस्तेमाल होने वाले इंजनों के लिए भारत में ही एक मरम्मत और रखरखाव केंद्र स्थापित किया जाएगा।
दरअसल, भारतीय वायुसेना के पास उपलब्ध फाइटर जेट अब पुराने हो चुके है। नई आधुनिक तकनीक सामने भारत को भी फाइटर जेट अपडेट करने की जरूरत है। आने वाले कुछ सालों में, मिराज, मिग-29 और जगुआर जैसे पुराने फाइटर जेट धीरे-धीरे सेवा से हटा दिए जाएंगे।
मौजूदा कमी को पूरा करने और भारत की रक्षा क्षमता को बनाए रखने के लिए, वायु सेना को हर साल दो नए स्क्वाड्रन (लगभग 36 से 40 विमान) शामिल करने की आवश्यकता है। नए फाइटर जेट मिलने में हो रही देरी चिंता का विषय है, क्योंकि इससे वायु सेना की ऑपरेशनल क्षमताओं पर असर पड़ता है।
अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों के मुताबिक, वायुसेना के पास करीब 29 फाइटर स्क्वाड्रन थे, जबकि स्वीकृत संख्या 42 के आसपास है। भारतीय वायु सेना में फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या घटकर 29 रह गई है, जबकि स्वीकृत संख्या 42.5 होनी चाहिए। पूर्व एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने चिंता जताई थी कि फाइटर जेट्स को शामिल करने में हो रही देरी से वायु सेना को नुकसान हो रहा है।
भारत की सरकारी विमान निर्माता कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने अगले साल 24 तेजस मार्क-1A जेट बनाने का वादा किया है। HAL द्वारा विमानों की डिलीवरी इस बात पर निर्भर करती है कि अमेरिका से F-404 इंजन कब मिलते हैं। मार्च से इनकी आपूर्ति शुरू होने की उम्मीद है, और 2025-26 में कुल 12 इंजन मिलने की संभावना है।
पूर्व एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने जेट निर्माण में निजी कंपनियों को शामिल करने का सुझाव दिया। उन्होंने टाटा-एयरबस के जॉइंट वेंचर का उदाहरण दिया, जो C-295 ट्रांसपोर्ट विमान बनाता है। उन्होंने सुझाव दिया था कि निजी क्षेत्र हर साल 12 से 18 अतिरिक्त जेट की आपूर्ति करने में मदद कर सकता है।
GE एयरोस्पेस और भारतीय वायु सेना ने भारत में F404-IN20 इंजनों के लिए एक मरम्मत और रखरखाव डिपो बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। ये इंजन तेजस जेट को शक्ति प्रदान करते हैं। इस नई सुविधा का पूर्ण स्वामित्व और संचालन भारतीय वायु सेना के पास होगा, जबकि GE एयरोस्पेस तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण, कर्मचारी, स्पेयर पार्ट्स और विशेष उपकरण उपलब्ध कराएगा।
भारत के भीतर ही इंजनों की मरम्मत करने से मरम्मत में लगने वाला समय काफी कम हो जाएगा, तेजस जेट की उपलब्धता बढ़ेगी और विदेशी देशों पर निर्भरता कम होगी। 7 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, GE ने सितंबर में चार और इंजन भेजे थे और कुल आपूर्ति 14 तक पहुंच गई थी। दिसंबर तक 22 इंजन मिलने का लक्ष्य बताया गया था।
GE एयरोस्पेस 40 वर्षों से भारत के विमानन क्षेत्र का हिस्सा रहा है। पुणे में इसका एक विनिर्माण संयंत्र है और यह 13 भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी कर रहा है। तेजस के अलावा, GE इंजनों का उपयोग भारतीय नौसेना के P-8I निगरानी विमानों, MH-60R हेलीकॉप्टरों, भारतीय वायु सेना के अपाचे अटैक हेलीकॉप्टरों, विमान वाहक पोत INS विक्रांत और P-17 शिवालिक-श्रेणी के युद्धपोतों (फ्रिगेट्स) में किया जाता है।
इन सभी प्लेटफॉर्म में F404-IN20 इंजन इस्तेमाल नहीं होता। अलग-अलग विमानों और जहाजों में GE के अलग-अलग इंजन या इंजन परिवार इस्तेमाल होते हैं। F404-IN20 खास तौर पर तेजस Mk1/Mk1A से जुड़ा है। यह इंजन तेजस Mk1 और Mk1A विमानों में इस्तेमाल होता है। भारत में मरम्मत और ओवरहॉल की सुविधा बनने से इंजनों को विदेश भेजने की जरूरत कम होगी और रखरखाव में लगने वाला समय घट सकता है।