करोड़ों की संपत्ति छोड़ देशसेवा में लगाया जीवन, जानिए महात्मा गांधी के 5वें पुत्र जमनालाल बजाज की कहानी

Jamnalal Bajaj Story: महात्मा गांधी के पांचवें पुत्र कहे जाने वाले जमनालाल बजाज ने उद्योग जगत के साथ स्वतंत्रता आंदोलन और समाज सुधार में भी अहम योगदान दिया। जानिए उनकी प्रेरक कहानी।
Jamnalal Bajaj
बजाज समूह के संस्थापक जमनालाल बजाज (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Highlights:

  • जमनालाल बजाज का जन्म 4 नवंबर 1889 को राजस्थान में हुआ था

  • महात्मा गांधी उन्हें अपना पांचवां पुत्र मानते थे

  • स्वतंत्रता आंदोलन और समाज सुधार में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा

Jamnalal Bajaj Birth Anniversary: जमनालाल बजाज का नाम देश के प्रमुख उद्योगपतियों, स्वतंत्रता सेनानियों और समाजसेवियों में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। महात्मा गांधी उन्हें अपना 'पांचवां पुत्र' मानते थे। जमनालाल ने न केवल बजाज समूह की स्थापना की, बल्कि अपनी संपत्ति और संसाधनों का इस्तेमाल देश की आजादी और समाज के उत्थान के लिए भी किया। स्वदेशी आंदोलन, महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण विकास और पशु कल्याण जैसे क्षेत्रों में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। आइए उनके जीवन, संघर्ष और उपलब्धियों के बारे में जानते हैं।

राजस्थान में हुआ था जन्म

जमनालाल बजाज का जन्म 4 नवंबर 1889 को राजस्थान के सीकर जिले के काशी का बास गांव में हुआ था। उनका जन्म कनीराम और बिरदीबाई के घर एक साधारण परिवार में हुआ था। आर्थिक तंगी के बावजूद बचपन से ही उनमें असाधारण बुद्धिमत्ता देखने को मिलती थी।

महज पांच साल की उम्र में वर्धा के धनी व्यापारी सेठ बछराज बजाज ने उन्हें गोद ले लिया। सेठ बछराज ब्रिटिश शासन के दौर के प्रतिष्ठित व्यापारियों में शामिल थे। उन्होंने जमनालाल को अपने संरक्षण में रखा और कारोबार की बारीकियां सिखाईं।

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17 साल की उम्र में संभाल लिया था कारोबार

जमनालाल बजाज ने बहुत कम उम्र में ही व्यापार की जिम्मेदारी संभाल ली थी। महज 17 साल की उम्र में उन्होंने कारोबार का कामकाज अपने हाथों में ले लिया। इसके बाद उन्होंने कई कंपनियों की स्थापना की, जिनमें से कई आगे चलकर बजाज समूह की नींव बनीं।

आज बजाज समूह ऑटोमोबाइल से लेकर वित्तीय सेवाओं तक विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान रखता है। हालांकि, जमनालाल के लिए संपत्ति केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का साधन नहीं थी। वह 'ट्रस्टीशिप' के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि धन और संपत्ति समाज तथा राष्ट्र की अमानत हैं और उनका इस्तेमाल जनहित में होना चाहिए।

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जमनालाल बजाज-महात्मा गांधी(सोर्स- सोशल मीडिया)

महात्मा गांधी के विचारों से हुए प्रभावित

साल 1915 में महात्मा गांधी के भारत लौटने के बाद जमनालाल बजाज के जीवन में बड़ा बदलाव आया। अहमदाबाद स्थित सत्याग्रह आश्रम जाने के दौरान वह गांधीजी के विचारों और सादगी से काफी प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रसेवा और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया।

गांधीजी के विचारों को अपनाते हुए उन्होंने अपने महंगे विदेशी कपड़ों की होली जलाई और खादी पहनना शुरू किया। उन्होंने अपने बच्चों को भी विनोबा भावे के सत्याग्रह आश्रम में शिक्षा दिलाई।

स्वतंत्रता आंदोलन में निभाई अहम भूमिका

जमनालाल बजाज ने स्वतंत्रता आंदोलन में कई महत्वपूर्ण आंदोलनों के दौरान सक्रिय भूमिका निभाई। इनमें असहयोग आंदोलन (1920-22), नागपुर झंडा सत्याग्रह, साइमन कमीशन का विरोध (1928), नमक सत्याग्रह (1930) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) प्रमुख हैं।

दांडी मार्च के दौरान महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद जमनालाल बजाज को भी दो साल की सजा सुनाई गई थी। वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा उन्होंने खादी बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई।

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जमनालाल बजाज(सोर्स- सोशल मीडिया)

समाज सुधार के लिए किए कई महत्वपूर्ण काम

जमनालाल बजाज का योगदान सिर्फ उद्योग और स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं था। वह सामाजिक कुरीतियों को दूर करने और समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाने के लिए भी लगातार काम करते रहे। साल 1935 में उन्होंने अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ की स्थापना की। इसका उद्देश्य ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देना और गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना था।

महिला सशक्तीकरण के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण पहल की। उन्होंने बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाया और विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया। इसके साथ ही दलितों के उत्थान के लिए हरिजन सेवक संघ के माध्यम से भी योगदान दिया। गौ-रक्षा और पशु कल्याण के प्रति भी उनका विशेष लगाव था। उन्होंने इन कार्यों को अपने जीवन के महत्वपूर्ण उद्देश्यों में शामिल किया।

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52 साल की उम्र में हुआ निधन

जमनालाल बजाज का निधन 11 फरवरी 1942 को महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ था। उस समय उनकी उम्र महज 52 साल थी। हालांकि, उनका जीवन भले ही छोटा रहा, लेकिन देश, समाज और उद्योग जगत के लिए उनका योगदान बेहद व्यापक रहा। उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उन्होंने वर्धा में सेवाग्राम आश्रम की स्थापना के लिए जमीन भी दान की थी।